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गरीबों को खाने के लाले पड़ रहे
June 6, 2020 • पुखराज जैन 'पथिक' • कविता

*पुखराज जैन 'पथिक'

गरीबों को खाने के लाले पड़ रहे, 
सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहे ।
 
इंसान की कोई किमत रही न अब, 
मंदिर में सोना चांदी हीरे चढ़ रहे।
 
दो रोटी काफी है भूख मिटाने को, 
बेवजह आपस में यह क्यों लड़ रहे ।
 
जगत जननी असहाय हो गई अब ,
अंग -अंग पर सुविधा के किले गड़ रहे
 
रकबा अन्न का घटता जा रहा है, 
सीमेंट कंक्रीट से भूमि को जड़ रहे ।
 
इतराओ न अपनी विकास पर तुम, 
हर कदम विनाश की ओर बढ़ रहे ।
 
कट जाते गरीबी में सर गरीब के ,
ईमानदारी जो पर सदा खड़े रहे ।
 
करने लगा मानव भी अब मनमानी ,
पानी के बदले बादलों से अंगारे झड़ रहे ।
*नागदा(उज्जैन)
 

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