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गंगा के जल को स्वच्छ रखने तथा भारत की रक्षा हेतु चिन्तन
May 3, 2020 • डॉ० सिकन्दर लाल • लेख

*डॉ० सिकन्दर लाल
 
"सीय राममय सब जग जानी। तथा  परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। एवं  हरि ब्यापक सर्बत्र समाना ।"
परम् ज्ञानी संत तुलसीदास जी ने जहाँ उपर्युक्त अपने द्वारा रचित पावन ग्रंथ रामचरितमानस के उक्त  चौपाई की पंक्ति के अनुसार, धर्म का कितना सकारात्मक अर्थ मानव को बताया साथ ही पूरा संसार रूपी रूपी पावन धाम के कर्ता-धर्ता, परमात्मा स्वरूप सीता- राम को बताया। इसी तरह सन्त कबीरदास जी ने भी कहा कि - *"ऐसे घटि- घटि राम हैं"* इस प्रकार से परम ज्ञानी संत तुलसीदास एवं सन्त कबीरदास जी की दृष्टिकोण में जान-बूझकर संसार के किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देना चाहिए साथ ही धर्म के नाम पर बड़े-बड़े मंदिर-मस्जिद- चर्च गुरुद्वारा आदि का निर्माण नहीं कराना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से जल-जंगल-जमीन आदि की कमी होती है तथा संत तुलसीदास एवं सन्त कबीरदास जी के दृष्टिकोण में पूरा संसार ही धाम है और इसमें रहने वाले सम्पूर्ण मानव एवं जीव-जंतु मूर्ति तथा इन सबका भरण-पोषण कर्ता स्वयं परमात्मा स्वरूप सीता-राम हैं।
लेकिन वर्तमान समय में परम् ज्ञानी संत तुलसीदास जी एवं पावन ग्रंथ उपनिषद् आदि के द्वारा मानव एवं जीव-जंतु के उत्थान हेतु इस उपर्युक्त चिन्तन को न मानकर कुछ मूर्ख एवं अज्ञानी मनुष्य तथा अधिकतर भोला-भाला मानव कुंभ मेला आदि के नाम पर करोड़ों की संख्या में समय- समय पर अपने तन का मैल एवं कपड़ा धोता रहा है और दूसरी ओर कुछ मूर्ख साधु घोड़े, हाथी, ऊँट सोने-चांदी के रथ आदि के ऊपर बैठ कर माँ गंगा इत्यादि महान् नदियों के पावन तट पर, ढेर सारे भोले-भाले लोगों को साथ में लेकर, अपने तन का मैल एवं कपड़ा धोने के लिए आते रहे हैं। संसार के कुछ मूर्ख एवं पाखण्डी मनुष्यों एवं भोले-भाले लोगों द्वारा, ऐसा करने से न तो माँ गंगा इत्यादि महान् नदियों का जल स्वच्छ होगा और न ही सरकार द्वारा कई अरब रुपए की लागत से कुभ मेला आदि का आयोजन करने से माँ गंगा इत्यादि महान् नदियों का जल स्वचछ होगा और न ही संसार रूपी पावन धाम में विराजमान् मानव एवं जीव-जंतु रूपी मूर्तियों को सुख-शांति मिलेगी। ये कुछ मूर्ख मनुष्य एक तरफ धर्म के नाम पर जीवों को कष्ट दे रहे हैं और दूसरी ओर नसमझ तथा भोले-भाले लोगों को साथ में लेकर माँ गंगा इत्यादि महान् नदियों के जल में अपना तन एवं कपड़े को धोकर माँ गंगा जैसी महान् नदियों के पावन जल को दूषित करने में लगे हुए हैं।
जबकि परम् ज्ञानी सन्त रविदास जी ने कहा है कि "मन चंगा तो कठोती में गंगा"* माँ गंगा इत्यादि महान् नदियों का पावन जल पीने तथा खेतों की सिंचाई आदि के लिए है| इसलिए पावन ग्रन्थ ऋग्वेद, उपनिषद् आदि में माँ गंगा इत्यादि महान् नदियों से युक्त प्रकृति प्रदत्त उपहार - पेड़-पौधे , पर्वत जीव-जंतु रूपी मूर्तियों की वंदना की गई है अर्थात् प्रकृति प्रदत्त उपहारों की संरक्षण-संवर्धन आदि की बात की गई है न कि धर्म के नाम पर जल-जंगल-जमीन आदि को अवैध तरीके से दुरुपयोग करने के लिए कब्जा करके, अपना घर-परिवार सजाना। यदि माँ गंगा जैसी महान् नदियों के जल को स्वच्छ रखना है तो धर्म के नाम पर होने वाले आयोजन को माँ गंगा जैसी महान् नदियों के तट से सदा के लिए बंद होना चाहिए साथ ही धर्म के नाम पर तटों को कब्जा करने वाले मूर्ख मनुष्यों को सख्ती से हटाया जाय | इसी तरह धर्म के नाम पर जो कुछ मूर्ख लोग जमीन आदि को कब्जा करके और उसमें बड़े मंदिर- मस्जिद-चर्च- गुरुद्वारा आदि का निर्माण करके, जमीन आदि को कम करने में लगे हुए है, यह भी बंद होना चाहिए | सरकार एवं आम जनमानस इस पुण्य काम में सहयोग करके मानों जीवन पर्यन्त कुम्भ तथा गंगा सप्तमी आदि का पर्व मना रही है जो कि सनातन ग्रन्थ ऋग्वेद, उपनिषद् आदि में समाये ज्ञान - विज्ञान के अनुकूल होगा| माँ गंगा नदियाँ महान् हैं| कहा भी गया है-
*गंगा सरस्वती सिन्धुर्ब्रह्मपुत्रश्च गण्डकी|कावेरी यमुना रेवा कृष्णा गोदा महानदी||*
 
*डॉ० सिकन्दर लाल, ढिंढुई ,प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
 

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