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February 6, 2020 • प्रो.शरद नारायण खरे • कहानी/लघुकथा

*प्रो.शरद नारायण खरे
"रमा बहन,आजकल आप दिखाई नहीं देतीं,कहां व्यस्त रहती हैं ?"
"अरे उमा बहन ,बात यह है कि मेरी बेटी एक माह के लिए मायके आई हुई है,तो उसी के साथ कंपनी बनी रहती है ।"
"पूरे एक माह के लिए ?"
"हां,बिलकुल"
"अरे बेटियां ससुराल में पिसती रहती हैं,तो उन्हें आराम की ज़रूरत भी तो होती है ।"
"और वह केवल मायके में ही संभव है ।"
"और ,आपकी बहू ,निशा ?"
"अरे वह तो एक नंबर की कामचोर है ।"
"मतलब,जब देखो तब थकावट का रोना रोकर बिस्तर की ओर दौड़ती है ।"
"अच्छा"
"पर मैं उसको ज़रा भी मनमानी नहीं करने देती ।उमा बहन ! बहुओं को जिसने सिर पर बैठाया,उसे पछताना पड़ता है ।"
   दूसरी ओर रमा की ये बातें सुनकर बेटी व बहू के बीच का कपटी फ़र्क आंसू बहा रहा था ।
 
*प्रो.शरद नारायण खरे
   मंडला(मप्र)
 
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