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दुगनी खुशी
June 29, 2020 • संजय वर्मा'दृष्टि' • कहानी/लघुकथा
*संजय वर्मा'दृष्टि'

किन्नर का समूह रामू के यहाँ बच्चा हुआ तो नाचने गाने के साथ उसके घर पर पहुँचा ।शगुन बतौर इनाम मांगा।रामू  ने कहा- साड़ी औऱ इनाम दिया।जो की कम था।वरिष्ठ किन्नर ने कहा- अरे भाई ,हम क्या रोज- रोज तो नही आते। किसी के यहाँ बच्चा जन्मा हो तो ही हम आते है।इससे हमारे समूह को मदद मिलती  है।हमारे यहाँ भी हमारे जैसे बाहर से आते है।हमे उनका स्वागत करना होता है।उन्हें वापस अपने गाँव भेजने पर हमारी आँखों मे आँसू आ जाते है।मेल -फिमेल  के नौकरी  के कॉलम में हमारा उल्लेख नही रहता।हमारे जीवन पर फ़िल्म उद्योग फ़िल्म भी बनाता है।मगर हमारे आर्थिक स्तर में बढ़ोत्तरी नही हो पाती।हमारी दुनिया अलग है।

रामू भाई आप हमारी आर्थिक रूप से मदद करोगे तो ऊपर वाला आपको आर्थिक रूप से मजबूत करेगा। हम सब शिक्षित है।इंग्लिश भी हमें आती है।किंतु ये हमारा पेशा है लोगों को दुआएं देना।हमे संघर्ष करने की आदत होगई।मगर हमारे दिलों में स्वाभिमान बरकरार है। हमारे भाई लोग इतने सुंदर लगते है।मानों सुंदरी धरती पर आ गई हो।हम अपने परिवार में खुश रहते।नाचते गाते,संवरते रहते है।

किन्नर की बात रामू को सच लगी।रामू ने कहा-मेरे यहाँ कई वर्षो कब बाद बच्चा हुआ है।मै अपनी खुशी से शगुन बतौर आप सभी को इनाम देता हूँ।वरिष्ठ किन्नर के साथ सभी किन्नरों ने मिलकर बधाई और दुआ रामू के परिवार को खुशी पूर्वक देकर एक बार फिर नृत्य किया,औऱ गाना गाया।शगुन की खुशी मदद के रूप में देकर रामू का ह्रदय में खुशी समाहित ही गई।
*मनावर(धार)
 

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