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दूसरी डिजिटल गुरुग्राम गरिमा काव्य गोष्ठी
May 24, 2020 • राजेन्द्र निगम "राज" • समाचार

देश में लॉकडाउन की स्थिति को देखते हुए साहित्य एवम समाज को समर्पित संस्था "परम्परा" गुरुग्राम द्वारा साहित्य की अविरल धारा बहाने हेतु काव्य तथा संगीत गोष्ठियों का अनवरत क्रम ज़ारी है। इसी क्रम में केवल गुरुग्राम के सहित्यकारों को लेकर दूसरी डिजिटल काव्य गोष्ठी "गुरुग्राम गरीमा गोष्ठी" का आयोजन रविवार, दिनांक 24 मई'2020 को किया गया। इसमें अपने-अपने घरों से ही मोबाइल व कम्प्यूटर के माध्यम से कविताएं सुनाकर, गोष्ठी सफलतापूर्वक आयोजित की गई । गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद स्टॉरेक्स विश्वविद्यालय के उप कुलपति डॉ अशोक दिवाकर जी ने की। वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती वीणा अग्रवाल मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान रहीं। वरिष्ठ सहित्यकार श्री ए डी अरोड़ा जी ने अति विशिष्ट अतिथि की भूमिका निभाई। गोष्ठी में सान्निध्य प्राप्त हुआ नवगीत व ग़ज़लकार श्री कृष्ण "भारतीय" जी का। विशेष रूप से उपस्थित रहे सुमधुर कंठ के मालिक शायर नरेन्द्र शर्मा "खामोश" जी एवम लोकप्रिय कवि श्री अनिल श्रीवास्तव जी।
गोष्ठी का आयोजन एवम संचालन महिला काव्य मंच की हरियाणा प्रदेश, उपाध्यक्ष श्रीमती इन्दु "राज" निगम व परम्परा के संस्थापक अध्यक्ष राजेन्द्र निगम "राज" द्वारा किया गया। इस गोष्ठी में कोरोना वायरस से लड़ने हेतु जागरूकता फैलाने वाली रचनाओं के साथ ही अन्य विषयों पर भी रचनायें प्रस्तुत की गईं। अध्यक्षता कर रहे डॉ दिवाकर जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि लोकडाउन के इस दौर में "परम्परा" संस्था द्वारा इस तरह ऑनलाइन काव्य गोष्ठियों का आयोजन वास्तव में सराहनीय है।
गोष्ठी में प्रस्तुत रचनाओं की एक बानगी इस प्रकार है-


एक खुशी पर सौ हैं ग़म, कितने बोझ उठाएँ हम
बहुत बड़ी दुनिया है भाई, और बची हैं सांसें कम
(कृष्ण भारतीय)
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जिस दिन हम अपने साथ रहना सीख जायेंगे , 
उस दिन अपनो के साथ रहना सीख जायेंगे । 
(अनिल श्रीवास्तव)
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ज़िंदगी अब यूँ बदली सी लगती है 
छाँव की कोख़ में धूप पलती है
(ए डी अरोड़ा)
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यूं तो कहता है दिल की बातें "रवि"।
बात दिल तक न पहुंचे तो क्या फायदा।।
(रवि शर्मा)
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हाथ मिलाय के नाहिं मिलो, अब दूर ही से राम राम करोना,
साफ सफाई को ध्यान रखो, कुछ दिन घर से बाहर निकसोना।
(नरेन्द्र शर्मा "ख़ामोश")
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मेरी सोन चिरैया मुझको याद बहुत तुम आती हो
लुका छिपी का खेल तुम्हारा रह रह याद दिलाती हो
(मीरा निगम)
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एक औरत के वजूद केा नकारने वालो, 
तुम उसके बिना बेवजूद हो जाओगे

(परिणीता सिन्हा)
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अन्याय सहन करती हूं  तो मन ही मन तड़पती हूं 
अन्याय के विरुद्ध लडती हूं  तो सबको अखरती हूं 
(वीणा अग्रवाल)
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कलम की  ताक़त पर विश्वास है मेरा 
बदलेगा यह समाज,दूर होगा अंधेरा। 
(शकुंतला मित्तल)
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भेज रहे है प्रेम निमंत्रण परिवार तुम्हे दिखावे को।
आ जाना न कभी भूल से यहां न तुम खाने को।।
(आर के रस्तोगी)
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तुम रुठती हो, मैं मनाता हूं,
कभी जी करता है,मैं रूठूं ,तुम मनाओ
(शिव कुमार निगम)
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जो सपना देखा है पूरा होना है
खुद से अब ये वादा करके सोना है
(इन्दु "राज" निगम)
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कुछ फरिश्तों ने जहाँ को है सुनाई ये ग़ज़ल
इस जहाँ के सब ग़मों की है दवाई ये ग़ज़ल
(राजेन्द्र निगम "राज")

 

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