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धरती करे  गुहार
April 22, 2020 • पुखराज पथिक • कविता

*पुखराज पथिक 
 
बोझ मुझ पर कब तक बढ़ाएं ही जाओगे, 
अस्मत को  मेरी कब तक लुटाएं जाओगे ।
मुझसे ही तो चलता है सबका दाना पानी , 
सीमेन्ट कंक्रीट मे कितनी दबाएं जाओगे ।
कितना निर्मल अमृत सा जल था कोख मे मेरी ,
रसायन का जहर कब तक पिलाएं जाओगे ।
 हरे भरे पेड़  लहराते थे मेरे ही सीने पर, 
काट काट कर रकबा कितना घटाएं जाओगे ।
हो गई हूँ जर्जर तुम्हारें ही ज़ुल्मों सितम से ,
कब तक आखिर मुझको यूँ सताएं जाओगे ।
 
*पुखराज पथिक, नागदा, उज्जैन
 

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