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देश ने हमेशा कोई राष्ट्र भक्त कुर्सी पर बैठाया है
May 31, 2020 • हर्षद भंडारी • कविता

*हर्षद भंडारी

प्रधान पद का मोल कोई समझ नहीं पाएगा 
जिसने जो पाया है उसे उसका ही मोल आएगा
लोभ के चलते वह सब भूल गया 
राम सा पुत्र भी केकई को नहीं भाया
यह भारत भूमि की बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण पिपासा है 
बैठा दो सिंहासन पर राम तो भी विरोध की भाषा है 
सम्मान न किसी का हम कर सकते हैं 
हम तो सिर्फ हर किसी को कोस सकते हैं 
नजरिया तो हमारा इतना गिर गया 
जो उस कुर्सी पर बैठे हम उसे चाटुकार समझते हैं
इंदिरा की नीतियों को भी हर किसी ने सहारा था 
पर कुछ घरों में उस दिन भी अंधियारा था 
राजीव का सपना उस समय मानो हास्य व्यंग्य लगता था 
पर आज भारत का आधुनिकरण उनका ही अटूट सपना था 
अटल के अटल इरादों को भी तोड़ने का प्रयास हुआ 
तभी तो तेरह दिनो में देश में पुनर्विचार हुआ 
उस महान नेता ने अटल इरादों को भी चाहा था 
करने को समय नहीं मिला तो काव्य रूपी गाथा में वह गाया था 
अर्थशास्त्र की परिभाषा हम जानते ही नहीं 
बस मनमोहन को मौन संबोधन दे दिया 
उनकी नीतियों का फायदा इस तरह हो गया 
मंदी की महामार भी भारत आसानी से सह गया 
हम क्यों पदों के महत्व को नहीं जानते 
हम क्यों निजी स्वार्थ के चलते उन पर शब्दों के बाण डालते
मोदी कोई देश का दुश्मन नही है वह भी प्रगति का सूचक है 
कोरोना महामारी का प्रकोप आज चारो ओर है 
फिर भी भारत को आत्मनिर्भर का सपना दिखाया है 
इस देश ने हमेशा कोई राष्ट्र भक्त कुर्सी पर बैठाया है

*हर्षद भंडारी, राजगढ़

 

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