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दीप जलाएं
April 3, 2020 • अशोक ' आनन '  • गीत/गजल

 
*अशोक ' आनन ' 
 
द्वारे  -  द्वारे    दीये    जलाकर - 
बंधु !  ज्योति  -   पर्व    मनाएं ।
 
दिखे   कहीं   न  आज  अंधेरा ।
दीपक  डालें  घर  -  घर   डेरा ।
पागल   हों   वे  जाएं   देहरियां - 
खुशियों  का   हो  जहां  बसेरा ।
 
पीकर   शबनम   जैसे    आंसू -
मुस्कानों   के   फूल   खिलाएं ।
 
निखरे भू का यों कोना - कोना ।
दुल्हन  का ज्यों रूप - सलौना ।
आकर  बैरी  तम  कर  न  जाए  -
भू    पर   कोई   जादू  -  टोना ।
 
गले लगाकर दीन - दु:खियों को -
उत्सव   उनके    साथ    मनाएं ।
 
भूख     कहीं   न    ठहरी    हो ।
कर्फ्यू  -  ग्रस्त   न   दुपहरी  हो ।
प्रात :   बनारस  ,  शामें   अवध - 
उजली  मन    की    देहरी    हो ।
 
मंदिर - मस्ज़िद -  गिरजाघर को - 
मानवता    का    स्वर्ग    बनाएं ।
 
*अशोक ' आनन ' ,मक्सी ,शाजापुर ( म . प्र .)
 

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