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दरमियां बाक़ी अभी‌ हैं खांइयाँ
July 14, 2020 • ✍️हमीद कानपुरी • गीत/गजल
✍️हमीद कानपुरी
 
दरमियां  बाक़ी   अभी‌  हैं  खांइयाँ।
कह  रही  हैं  चीख़  कर  तन्हाइयाँ।
 
मुल्क की  खातिर बहा कितना लहू,
सब  भुला  डाली  गयीं  क़ुर्बानियाँ।
 
उनको अपने  हुस्न पर  बेजा गुरूर,
हम भी हारे  कब भला हैं  बाज़ियाँ।
 
दूरियों  से   प्यार  कम   होता  नहीं,
दूर  दिल से  कर सकीं कब  दूरियाँ।
 
कल करोना काल में थीं जिस तरह,
अब नहीं  बाक़ी हैं  वैसी  सख़्तियाँ।
 
उनकी आमद की ख़बर सुनकर हमीद,
छा  गयीं  हर  एक  पर  मदहोशियाँ।
 

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