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दादाजी जैसा प्यारा वह बूढ़ा पीपल
September 2, 2020 • ✍️रविकान्त सनाढ्य • कविता

✍️रविकान्त सनाढ्य
 
मेरे गाँव में एक 
पुरानी बावड़ी के निकट 
खड़ा हुआ है 
लंबा- ऊँचा-सा 
एक  बूढ़ा  पीपल ! 
 
लोगों से सुनते आए हैं 
भूत रहता है 
पीपल के पेड़ में ! 
  
जाता नहीं 
रात में अकेले 
उसके नीचे 
एक भी जन ! 
जबकि सही यह है कि 
वह देता है हमें 
भरपूर आक्सीजन !
 
हमारी सं स्कृति में 
बहुत मान्यता है 
अश्वत्थ की  ! 
पुण्य-वृक्ष मानकर 
होता है इसका पूजन ! 
 
पीपल के पत्ते 
रात के सन्नाटे में 
हिलते हैं ।
खड़-खड़ करते हुए 
उछलते हैं ।
 
करते हैं उल्लास और 
उमंग की अभिव्यक्ति !
 
सूखते  जाते हैं यह बताने को , 
कर रहे हैं हम पुराने पत्ते 
नये पत्तों का स्वागत ! 
 
बूढ़े दादा का 
दुलार है यह 
जोर-शोर से ! 
 
जैसे अभयदान 
देता हुआ 
कह रहा हो पीपल, 
में हूँ ना संरक्षक 
तुम्हारा ! 
 
नवल -परंपराओं का 
आगाज़ करनेवाला, 
हमें दुलराने वाला  
सांस्कृतिक वृक्ष है 
पीपल !
 
सचमुच बहुत प्यारा 
लगता है मुझे बहुत प्यारा 
दादा जी जैसा 
वह बूढ़ा पीपल ! 
 
आओ, हम अंधविश्वास 
और भ्रांतियों को तिलांजलि दें 
हाथ में ले , छोड़कर जल !!
 
*भीलवाड़ा(राजस्थान ) 
 

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