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चोर पकड़ने की परंपरा का निर्वहन
July 12, 2020 • ललित भाटी • व्यंग्य

*ललित भाटी

शहर के अनेक मोहल्लों की तरह ,मेरे मोहल्ले में भी आए दिन चोरियां होती रहती हैं। जब भी मोहल्ले की किसी गली में चोरी होती है, संबंधित थाने की पुलिस वहां रात तो ठीक, दिन तक में अपनी गश्त बढ़ा देती है। इसे यूं समझें, यदि रात में दस बार तो दिन में पांच बार। जिस जगह चोरी होती है, वहां पुलिस वाहन को एकदम तीखा सायरन बजाकर बार-बार घुमाया जाता है। ऐसा इसलिए कि, वहां के लोगों में पुलिस के आने की आमद हो सके। 
कुछ दिनों पश्चात जब लोग जब उस चोरी की घटना को भूलने लगते हैं, तो पुलिस द्वारा उक्त अति सक्रियता से की जाने वाली गश्त भी प्रभावित होने लगती है। वह उक्त स्थिति के कारण तत्काल बंद हो जाती है। ऐसा होने के कुछ विश्राम के बाद ,चोर जब पुनः अपने काम पर लग जाते हैं, तो चोरों द्वारा सफलता प्राप्त कर लेने के पश्चात पुलिस भी अपने पहले जैसे उसी काम पर लग जाती है। चोरी को नियंत्रित करने एवं चोरों को पकड़ने हेतु अमल में लाई जा रही यह अति कारगर प्रणाली , दशकों से हमारे समाज में उपयोग में लाई जा रही है। शायद इसी बात का यह बेहतर परिणाम है कि, दोनों ही महकमें आज तक अपना अपना कार्य सुचारू रूप से करते आ रहे हैं। 
*इंदौर
 

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