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बूढी़ अलमारी में लगता बचपन कैद है
May 14, 2020 • सौरभ चातक • कविता


*सौरभ चातक
बचपन  में गुड्डे  गुड़िया पाने  के रोने
बमुश्किल  पाए  थे  पापा से खिलौने
पर अब खिलौने से हो गया विच्छेद है
बूढी़अलमारी में लगता बचपन कैद है

प्लास्टिक की बॉल ,साइट से टूटा बेट
मोहल्ले के सारे बच्चे खेलतेथे क्रिकेट
रखे कांच,जिस खिड़की में करा छेद है  
बूढी़अलमारी में लगता बचपन कैद है

कुछ कंचे नारंगी,हरे,पीले, नीले रंग के
कूची ने कुछ चित्र बनाए अनूठे ढंग के
क्यों रंगीन चित्रों का रंग हुआ सफेद है
बूढी़ अलमारी में लगता बचपन कैद है

बचपन मन में नहीं था जरा सा भी मैल
खेले राजा,मंत्री, चोर ,सिपाही का खेल
समय ने बताया क्या होता शब्द भेद है
बूढी़ अलमारी में लगता बचपन कैद है

लकड़ी की स्टिक से बनाया था जो घर
घर बना के सिर पर उठाया था जो घर
अब इस घर, उस घर करने लगे भेद है
बूढी़ अलमारी में लगता बचपन कैद है

दादी का चश्मा रखता था हमपर नजर
नजर इस बात की ,कहीं लगे ना नजर
बुरीआदतों को करा जीवन से निषेध है
बूढी़अलमारी में लगता बचपन कैद है

ममतामयी तपिश के बारे में  सुना था
दो सँलाईयों ने प्रेम का स्वेटर बुना था
कैसे बना नर्म हाथ से गर्म स्वेटर,भेद है
बूढी़ अलमारी में लगता बचपन कैद है


*सौरभ चातक, उज्जैन

 

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