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भूल गए सब पैंतरे
August 18, 2020 • ✍️नवीन माथुर पंचोली • दोहा/छंद/हायकु
✍️नवीन माथुर पंचोली
 
भूल गए सब पैंतरे , भूल  गए  सब  ताव।
अपनों से लड़ना पड़ा,खाये दिल पर घाव।।
 
उसकी मुझे तलाश  थी, मेरी उसे तलाश।
दोनों थे  जब  सामनें ,भूले  होश हवाश।।
 
रख्खी  बात गरीब  ने,माने  दो या चार।
पर अमीर की बात पर,उठ्ठे हाथ हजार।।
 
उनको भीअभिमान था, हमको भी अभिमान।
इसीलिये तो रह गए, आपस में  अनजान।।
 
थोड़ी सी आँखे मिली ,चढ़ा प्रेम परवान।
आकर्षण बस देह का,दिल दोनों अंजान।।
 
अफरा-तफ़री मच गई,हुई तनिक सी बात।
भीड़-भाड़ माहौल के, होते ये  हालात।।
 
कागज़ पर लिखते रहे,हम गाँवों की पीर।
कागज़ पर ही रह गई,गाँवों की तक़दीर।।
 
पढ़ लिखकर जाते गए,सब शहरों की ओर।
गाँवों से कटती रही, यूँ  शिक्षा की डोर।।
 
गाय-भैंस पलते नहीं, दूध-दही भरमार।
माँगों की पूर्ति करे,  नकली कारोबार।।
 
बच्चे बस्ते ढो रहे,शिक्षाविद ज़ालिम।
बचपन के माहौल में,मजबूरी तालीम।।
 
काम कभी छोटा नहीं, रखिये यही विचार।
जोअवसर पर मिल गया, कर लेना स्वीकार।।
 
सत्ता का सुखभोगते, लोकतंत्र के खास।
आमजनों के भाग में,फाँके और उपवास।
 
जिसका जितना काम है,उसका उतना नाम।
निष्कामों को चाहिए बस खाली आराम।।
 
जैसे-तैसे ही भले,कुछ तो बदले योग।
गाँव-गाँव मिलने लगे,खाते-पीते लोग।।
 
*अमझेरा धार मप्र
 

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