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बेनूर चेहरे
June 27, 2020 • आशीष दशोत्तर • लेख
*आशीष दशोत्तर
"कम से कम आप तो बोहनी करवा दो बाबूजी। सुबह से घूमते-घूमते दोपहर हो गई है। अभी तक एक भी काम नहीं किया। लगता है आज फिर खाली हाथ घर लौटना पड़ेगा।" उस मासूम आवाज़ में न जाने कितना दर्द था जो आंखों के सामने उभर आया।
शहर से लगे किसी गांव से वह अपने भाई के साथ आता है। दोनों भाई साइकिल पर सवार होकर शहर पहुंचते हैं।शहर पहुंचते ही अपनी साइकिल किसी होटल पर खड़ी करते हैं।  वहां से धंधे पर निकल जाते हैं। अभी उनकी जिंदगी का यही क्रम है। दिन भर घूम कर जितना भी कमा पाते हैं, कमा लेते हैं और शाम होते होते फिर वही सायकिल उठाकर अपने गांव लौट जाते हैं । उम्र तक़रीबन तेरह से पंद्रह वर्ष। काम करने का हौंसला बरकरार। हालत एकदम कमज़ोर।
यह दोनों भाई शहर में कोई भारी व्यापार करने नहीं आते। न ही शौक से साइकिल चलाकर इतनी दूर आते हैं। कुछ हालात में मजबूर किया, कुछ परिवार की स्थिति ने झकझोरा। इन्हें यहां आने पर विवश होना पड़ा। ये दोनों भाई अपने हाथ में एक बैग लिए रहते हैं ।इन दिनों यही बैग इनके जीवन का जरिया बना हुआ है। किताब और कलम रखने के लिए बने इस बैग में हालात ने तीन ब्रश, दो पॉलिश की डिब्बी, कुछ कपड़े और जूते के कुछ तलवे रख दिए। वक्त ने इनके हाथ में जब यह सब थमा ही दिया तो ये बूट पॉलिश का काम करने लगे।
पास में आते ही यह सब उसने मुझे बताया। कहने लगा बहुत मजबूरी है इसलिए यह धंधा कर रहे हैं। आप तो पॉलिश करवा लीजिए। सबसे पहला सवाल जो हम जैसे पढ़े-लिखे लिखे होने का दावा करने वाले लोग अक्सर किया करते हैं, वही सवाल साथ खड़े मित्र ने उससे किया -" स्कूल जाने की उम्र में यह काम करते हुए शर्म नहीं आती?"  वह बिना रुके बोला, आती है बाबूजी । बहुत शर्म आती है। लेकिन क्या करें इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है। जब हम गांव से निकलते हैं न तो इस बैग को छुपाकर लाते हैं ताकि कोई हमारा दोस्त देख न ले । अगर देख लेगा तो हमें चिढ़ाएगा। हम भी स्कूल जाते हैं न। कोई हमारे परिवार को पालने की गारंटी दे तो हम यह काम कभी नहीं करें।  पिछले तीन महीने से घर में कुछ नहीं है । इधर-उधर से जो मिल रहा है उससे गुज़ारा हो रहा है । मां छोटे-मोटे काम करती है तो हम यह काम कर अपनी मां का हाथ बंटा रहे हैं। पिता को तो दारू की दुकान खुलने के बाद से घर की चिंता ही नहीं रही। बाबूजी ये दारू की दुकान बंद ही रहती तो हमारे पिता हमारे साथ पिता बनकर तो रहते। अब आप ही बताइए हम इस बैग में किताबें कैसे रखें। अपनी भाषा में कही गई उसकी यह बात हम मित्रों को भीतर तक हिला गई। हमारे पैरों से जूते उतर गए। जूतों पर पॉलिश करते हुए उसका चेहरा चमक रहा था। 
पॉलिश करते हुए उसने अपनी दास्तान सामने रखी। दोनों भाई शहर में घूम कर जूतों की पॉलिश किया करते हैं । दिन भर में बमुश्किल पचास रूपए कमा पाते हैं। इन दिनों तो इतना भी नहीं मिल रहा है। लोग अपने जूतों की पॉलिश भी किसी अनजान से करवाने में घबराने लगे हैं। "ये दिन कब बदलेंगें बाबूजी?" कहते हुए उसने पॉलिश किए जूते सामने रख दिए। अपना मेहनताना लेकर वह आगे बढ़ गया, मगर उसके सवाल का जवाब हममें से कोई नहीं दे सका।
ये बच्चे सबके सामने से गुज़र रहे हैं । सारी व्यवस्थाएं इन्हें हाथ में यह झोला लिए देख रही है । तमाम दावे और फ़ैसले इन्हें इस हालत में पा कर भी ख़ामोश हैं।  
अपने चेहरे की चमक खो चुके इन बच्चों को संक्रमण काल से उत्पन्न हालात ने यह काम करने पर मजबूर कर दिया है। हो सकता है यह इनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा भी बन जाए। मगर ये बच्चे अपने चेहरे की चमक को पाने के लिए हमारे चमकते चेहरों की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहे हैं।
*रतलाम (म.प्र.)
 

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