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बरसती आग
May 22, 2020 • सुनील कुमार माथुर • कविता

*सुनील कुमार माथुर
कोरोना के कहर से अभी
हम पूरी तरह से निपट भी नहीं पायें कि
बरसती आग ने हमारे जीवन को
झकझोर कर रख दिया 
दिन निकलने के साथ ही साथ 
गर्मी का कहर दिखने लगता है जो
देर रात तक तांडव करता रहता है 
आसमान से बरसती आग में 
लोग झुलसने लग गयें है 
अत्यधिक गर्मी के कारण
धरती और आसमान के बीच
इंसान व पशु-पक्षियों के 
हाल बेहाल होने लगें हैं 
भंयकर गर्मी के कारण 
गांव व शहर तवे की तरह तप रहें है 
गर्म थपेडों के चलतें 
पंखे व कूलर भी
गर्म हवा फैंक रहें है 
गर्म हवा के झौंके के चलतें 
ऐसा लगता कि 
मानों आप पंखे के नीचे नहीं वरन् 
गर्म भट्टी के पास बैठे हो
हरे भरे वृक्षों को काट कर
इंसान ने यह 
कैसी आफत मोल ले ली है 
हे इंसान  ! 
अब भी वक्त हैं 
पौधारोपण कर उनकी देखरेख कर
वृक्ष बचेगे तभी हरियाली होंगी 
जब हरियाली होंगी तभी
हमें छाया मिलेंगी और
जब चारों ओर हरियाली होंगी तभी 
वर्षा होगी और हमें 
गर्म थपेडों से राहत मिलेंगी 
आईये हम सब मिलकर 
वृक्षारोपण करें और 
हर गांव व शहर को हरा भरा बनायें चूंकि 
हरे भरे वृक्ष हैं तो हम हैं अन्यथा
ये लू की थपेडे और 
तवे की तरह तपने वालें शहर हैं 
 
*सुनील कुमार माथुर ,जोधपुर राजस्थान 
 
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