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बलि का बकरा 
July 26, 2020 • ✍️सुरेश सौरभ • दोहा/छंद/हायकु
✍️सुरेश सौरभ
दरोगा जी ने अपनी पत्नी को फोन करके कहा-अब कुछ दिनों तक घर न आ सकूंगा, तब पत्नी ने बड़ी हैरानी से कहा-ओह! ऐसा क्यों?
दरोगा-तुमसे अब क्या छिपाना कुछ दिन पहले मेरे खून का सैंपल लिया गया था। आज जांच आई है, तो मैं कोरोना पोजीटिव पाया गया। यह सुन उसकी पत्नी का कलेजा मुंह को आ लगा। रूंधे गले से रूआंसे स्वर मेें-बोली यह सब कैसे हो गया।
दरोगा जी बुझे दिल से बोले-कुछ रोज पहले डाक्टरों की टीम के साथ दो सिपाहियों को लेकर मैं एक कालोनी में गया था, कोरोना संदिग्धों की तलाश मेें, वहां हमारी टीम पर कुछ अराजक तत्वों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। किसी तरह हम लोग वहां से भाग कर चले आए। और जब यह जानकारी हमारे एसपी साहब को मिली, तब उन्होेंने काफी फोर्स वहां भेजते हुए गुस्से में कहा कि जाओ पूरी कालोनी को एक तरफ से बजा आओे। वहां जाकर फिर हम लोगों ने पूरी कालोनी के सारे लोगाें को एक तरफ से सूता। गलती की कुछ लोगों ने और बिना सही अरोपी जाने-समझे बेचारे पिट गये सब। उन्हीं में से कुछ संक्रमित लोगाें के सम्पर्क में हमारे कुछ साथी आ गये। गुस्से में हम लोगाें ने महिलाओं और बच्चों तक को न छोड़ा। आज वही पाप भुगत रहा हूं... और हो सकता मेरा परिवार भी भुगते। ये ऊपर वाला, तो हम लोगों को ही बलि का बकरा बनाता हैं।
अपनी वर्दी पर हमेशा रोब गांठने वाले बेहद असहाय हो चुके दरोगा जी के छलकते दर्द से आज उसकी पत्नी भी बहुत गमजदा हो गईं और बेहद तकलीफ में बोलीं-ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं, पर आप अपनी वर्दी के रोब में मेरी या किसी की भी सुनते कब थे। दरोगा लज्जित होकर दुःखी स्वर में बोला-जब अपने सिर पर मुसीबत पड़ती है, तब पता चलता है दूसराें के दर्द का।  
 
*लखीमपुर खीरी
 

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