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बगावत करती औरतें
September 12, 2020 • ✍️मीरा सिंह 'मीरा' • कविता


✍️मीरा सिंह 'मीरा'

जमाने को कभी
अच्छी नहीं लगती
बगावत करती औरतें
पुरातन व्यवस्था को
चुनौती देती औरतें
लोगों की आंखों में
किरकिरी की तरह
चुभती रहती हैं
लोग उसकी बोलती
बंद करना चाहते हैं
तरह तरह के
ज़ुल्म ढाहते हैं
उसे डराना चाहते हैं
उसकी आवाज
दबाना चाहते हैं
उस पर आदतन
बुलडोजर चलाते हैं
उसके घर ढाहते हैं
उसके हौंसले को
यूं धूलधूसरित
करना चाहते हैं
पर वह मरदानी
जाने किस तत्व की
बनी होती है
टूट कर भी
नहीं टूटती है
आपने पथ पर
अडिग रहती है
उसको तोड़ने वाले
टकराकर उससे
चूर चूर हो जाते हैं
इज्जत अपनी हाथों
पलीद कर जाते हैं
बगावत करती औरतें
राख की ढेर में छिपी
चिनगारी होती हैं
नजर तो नहीं आती
पर खोरने पर
सुलग उठती हैं
थोड़ी हवा पाकर
धधक उठती हैं
उसकी धमक से
इर्द-गिर्द मौजूद 
पुरातन परंपराएं
धू धू कर जल उठती हैं।

*डुमरांव,जिला- बक्सर, बिहार

 

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