ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
बादल और नदी
July 24, 2020 • ✍️संजय वर्मा 'दृष्टि' • कविता

✍️संजय वर्मा 'दृष्टि'
इतनी चुप क्यों हो
जैसे रीति नदियाँ
तुम्हारी खिलखिलाहट
होती थी कभी
झरनों जैसी कलकल।
रूठना तो कोई तुमसे सीखे
जैसे नदियाँ रूठती बादलों से
मै बादल तुम बनी
स्वप्न में नदी सी
सूरज की किरणें झांक रही
बादलों के पर्दे से
संग इंद्रधनुष का तोहफा लिए
सात रंगों में खिलकर
मृगतृष्णा दिखाता नदियों को।
नदियाँ सूखी रहे
तो नदियाँ कहाँ से
बिन पानी से 
भला उसकी क्या पहचान
जैसे तुम औऱ मै हूँ।
रीति नदियों में 
पानी भरने को बेताब बादल
सौतन हवाओं से होता
परेशान।
नदी से प्रेम है तो
बरसेगा जरूर
नही बरसेगा तो
नदियां कहाँ से 
कलकल के गीत गुनगुनाए ।
औऱ बादल सौतन हवाओं के
चक्कर मे
फिजूल गर्जन के गीत क्यों गाए।
जो गरजते क्या 
वो बरसते नही
यदि प्यार सच्चा हो तो
बरसते जरूर।
 
*मनावर(धार)
 

अपने विचार/रचना आप भी हमें मेल कर सकते है- shabdpravah.ujjain@gmail.com पर।

साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.com

यूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw