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बाबा का बिक गया मकान
June 17, 2020 • अशोक 'आनन' • गीत/गजल
              
*अशोक ' आनन'
 
आज नहीं -
तो कल बिकना है ।
बाबा का बिक गया मकान ।
 
चार    लड़के   ,   चारों    अलग -
कोई न रहता उनके साथ ।
खेती - बाड़ी भी अलग - अलग -
कोई  नहीं  बंटाता   हाथ ।
 
खटपट -
उनसे होती रहती ।
बहुएं मिलकर भरतीं कान ।
 
अपने   चौके  ,  अपने   चूल्हे -
सबके  अपने  तुलसी - चौरे ।
वर्षों   से   बिन   बोले    बच्चे -
मिलने को  ले  हृदय हिलोरें ।
 
देख बड़ों को -
अब बच्चे भी रहते ।
दिन भर अपनी भौंहें तान ।
 
बड़ी  जतन  से  जिन्हें  उछेरा -
जड़  उन्हींने  ,  उनकी  काटी ।
घर -  ज़मीन  की बात नहीं है -
मां  तक  उन्होंने अपनी बांटी ।
 
कैसे -
उन्हें अब वे क्षमा करें ?
किया जिन्होंने बस अपमान ।
 
बेच - बाचकर अपने घर  को -
जाओ  बाबा  , वृद्ध - आश्रम ।
यही आपकी नियति अब  है -
आप ज़रा  भी  करो  न   ग़म ।
 
व्यर्थ है -
अब ये आंसू बहाना ।
ओस हुई अब आपको पाषाण ।
*मक्सी,जिला - शाजापुर ( म. प्र.)
 

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