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बाबा जुगनू बुलाते हैं
October 9, 2020 • ✍️प्रेम बजाज • कविता
✍️प्रेम बजाज
आइ जब से मां की कोख में ,
मां की लाडली ,
बाप के घर की रोशनी सब कहते हैं  ,
मां ने रखा नाम रोशनी ,
बाबा जुगनू बुलाते हैं  ।
लगा कर के कलेजे से
मुझको पलकों पे सब बिठाते थे  ।
उड़ती फिरती घर आंगन में ,
पंख हवा में लहराते थे ‌।
जुगनू जैसी मेरी चमक
चांदनी देख सब हर्षाते थे ।
आंगन से पहुंची बगिया में ,
फैला दी रोशनी अपनी अंधियारी  रातों में ।
चमक के ऐसे उड़ी आकाश में 
तारा जैसे चमके नील गगन में ।
देखा फिर एक शैतान मच्छर ने
आंखों में उसके चुभ गई चमक मेरी
बस फिर समझो आ गई शामत मेरी ।
झट से आया पास मेरे वो ,
आकर के धर दबोचा मुझको
छीना-छपटी में पंख मेरे टूटे
चमक मेरी भी जाने कहां फिर खो गई वो । 
मां रोए ,बाबा आंसु बहाते हैं
कोई तो इन्साफ दिला दो ये गुहार लगाते हैं ।
देख के मेरा हाल
ऐसा सब परिंदे भी चादर तान के सोते हैं
ये जहरीले मच्छर आज फिर
किसी जुगनू को मसलने को
आजाद यूं घूमा करते हैं ।
*जगाधरी ( यमुनानगर ) 
 

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