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अस्पताल वालों की ऐसी ईमानदारी पर पद्मश्री तो बनता है
July 23, 2020 • ✍️सुशील कुमार 'नवीन' • समीक्षा/पुस्तक चर्चा

✍️सुशील कुमार 'नवीन'

आज पूरा विश्व कोरोना से लड़ रहा है। अभी तक कोई इसका ठोस इलाज ढूंढने में कामयाब नहीं हो पाया है। ऐसे दौर में देवदूत अस्पतालों का ही एकमात्र सहारा है। वो भी ऐसे अस्पतालों का जो ईमानदारी की मिसाल हो। इलाज के नाम पर धोखाधड़ी न करते हो। जो खर्चा लगा हो वही लें। व्यर्थ का एक रुपया भी जिनके लिए हराम हो।आप भी सोच रहें होंगे कि भला ऐसा भी कभी हो सकता है। अस्पताल तो वो खान है जो दिन और रात सोना उगलती हैं। यहां जिंदा हाथी से ज्यादा मरे की कीमत होती हैं। 

एक किस्सा मुझे याद आ रहा है। एक बार किसी ने जहरीली दवा पीने का झूठ मूठ का ड्रामा रच दिया। घरवालों को डराने के लिए कपड़ों पर दवा छिड़क ली। और जोर जोर से चिल्लाने लगा- मैं तो अब मर रहा हूं। घरवालों के हाथपांव फूल गए। फ़ौरन उसे वहां से उठाया और अस्पताल ले जाने लगे। अस्पताल में झूठ का भांडा फूटना पक्का था सो वह महाशय घरवालों को कहने लगा कि मैंने कोई दवा नहीं पी। मैंने तो झूठ बोला है। वो सच बोल रहा था, घरवाले फिर भी यकीन नहीं कर रहे थे। अस्पताल आ गया। दो मस्टण्डे आये और  स्ट्रेचर पर डाल इमरजेंसी में ले गए। जहरीली दवा पीने का मामला जान फ़ौरन स्ट्रेचर ऑपरेशन थियेटर की ओर रवाना कर दिया गया। स्ट्रेचर पर महोदय अब भी चिल्ला रहे थे कि मैंने कोई दवा नहीं पी ,मैने तो मजाक किया है। बार-बार चिल्लाने पर स्ट्रेचर के बेल्ट से उसके हाथ और पांव बांध दिए गए। पास खड़े मस्टंडे बोले- तू बताएगा हमें कि दवा पी है या नहीं। अब हमारा काम है ये।चुपचाप पड़ा रह, नहीं तो बेहोशी का इंजेक्शन लगा देंगे। इतना कहने के बाद एक मोटी सी पाइप उसकी नाक में अंदर की तरफ फंसा दी।एक पाइप मुहं से गले में अटका दी गई। अब तो लाख चाहकर भी बोलना सम्भव नहीं रहा। शुरुआती चेकअप में ही अस्पताल वाले जान गए कि इसने कोई दवा नहीं पी। परिजनों को फौरन 2 लाख काउंटर पर जमा कराने के आदेश हो गए। 72 घन्टे मरीज के लिए अभी खतरे के ही बताये गए। उसे किसी से भी मिलने की अभी इजाजत नहीं दी गई। तीन दिन में 3 लाख और जमा करा दिए गए। चौथे दिन डॉक्टर ने विजिट के बाद परिजनों को खुशी की खबर सुनाई। मरीज होश में है। उसे देख सकते हैं पर बात अभी नहीं कर सकते। घरवाले पास दिखे तो बेड पर लेटे महोदय को थोड़ा हौसला बंधा। हाथ के इशारे से यहां से निकाल ले जाने की अनुनय विनय की। दस दिन बाद उसकी नाक और मुहं की नलकी निकाल दी गयी। आवाज साफ नहीं निकल रही थी। दो दिन बाद उसे छुट्टी दे दी गई। तब तक 10 लाख का बिल बन चुका था। घर आने के 5-7 दिन बाद वो रूटीन में आ गया। आवाज साफ निकलने में दो माह लग गए। इस दौरान किसी ने उससे पूछा कि भई, दवा क्यों पी थी तो उसने कहा- मैंने कोई दवा नहीं पी। इस पर जवाब मिला घर के सारे खूड(जमीन) बिकवा दिए और ये कह रहा है कि दवाई नहीं पी। उधर वो सोच रहा था कि बिना पिये ये हाल हुआ यदि पी लेता तो ना जाने अस्पताल वाले क्या करते।

ये किस्सा आप सब के लिए इसलिए प्रासंगिक बनाया। कल ही सोशल मीडिया पर कोरोना काल में रोगी के उपचार का बिल देखा। अस्पताल प्रबंधन की ईमानदारी देख आंसू निकलने को आ गए। 16 दिन में मात्र 405 रुपए की ही दवाई मरीज को दी गई। एक भी रुपया ज्यादा दवाई का नहीं दिखाया गया। हालांकि बिल उनका 3 लाख 55 हजार का ही था। शेष खर्च तो सुविधाओं का था। बीच बीच में अस्पताल स्टाफ ने चुटकुले सुना दिल बहलाया, उसके सिर्फ़ 32 हजार लिए गए। 5 स्टार टाइप रूम के प्रतिदिन 5 हजार के हिसाब से मात्र 80 हजार लिए गए। फैंसी ड्रेस पीपीई किट के नाम पर 120 ड्रेस के प्रति दो हजार के हिसाब से 2 लाख 40 हजार लिए गए। अस्पताल वालों का कहना था कि हम तो पुरानी ड्रेस से काम चला लेते पर आप लोगों की ही डिमांड हर बार नई ड्रेस की थी। जनरल वार्ड में आप नहीं रहना चाहते थे सो स्पेशल रूम देना पड़ा। दवाई जो दी उसी का बिल लिया है। अस्पताल वालों की ऐसी ईमानदारी पर पद्मश्री तो बनता है। मैं तो रिकमंड करता हूं आप भी विचार कर लेना। और भी कोई ऐसा बिल बने तो फौरन मोदी जी के पास पद्मश्री की संस्तुति के लिए भेज देना। 2-3 करोड़ बिल वालों को तो भारत रत्न के लिए ही रिकमंड करना।

*हिसार

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