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अनुभूत को अभिव्यक्त करती ध्वनि ही भाषा का मूल है
June 4, 2020 • पुनिता भारद्वाज • समाचार


जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर की प्रतिष्ठित संस्था विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर के 31 वे दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान 'भाषाविज्ञान पर्व, के अन्तर्गत भाषा के उद्भव, विकास, साम्य, भिन्नता, प्रकृति और संस्कार आदि विविध पक्षों पर विचार विनिमय संपन्न हुआ। मुखिया की आसंदी को गौरवान्वित किया संस्कृत - हिंदी साहित्य की प्रख्यात हस्ताक्षर डॉ. चंद्रा चतुर्वेदी ने। आयोजन के पाहुना की आसंदी पर प्रतिष्ठित हुए चर्चित साहित्यसेवी अरुण श्रीवास्तव 'अर्णव'। इंजी. उदयभानु तिवारी 'मधुकर' द्वारा सरस् सरस्वती वंदना का पश्चात् विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान के संयोजक, छन्दशास्त्री, समालोचक, नवगीत-दोहाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा -''अनुभूत को अभिव्यक्त करने के लिए भावमुद्रा तथा ध्वनि की आवश्यकता होती है। मानव ने ध्वनि प्रकृति से ग्रहण की। सलिल प्रवाह की कलकल, पंछियों का कलरव, पवन वेग की सन सन, मेघ की गर्जन, दामिनी की तड़क, सर्प की फुँफकार, शेर की दहाड़ आदि से मनुष्य ने सुख, भय आदि की अनुभूति कर उन ध्वनियों को दुहराकर अन्य मानवों को सूचित किया। ध्वनियों का यह प्रयोग ही भाषा का मूल है। क्रमश: ध्वनियों की तीव्रता-मंदता, आवृत्ति आदि ने वह रूप लिए जिसमें हम कुछ-ध्वनियों व  भाव मुद्रा में नवजात शिशु से बात करते हैं। नवजात शिशु कुछ नहीं जानता, किसी शब्द का अर्थ नहीं जनता पर कहा गया भाव ग्रहण कर पाता है। यही भाषा का आरंभ है। ध्वनियों के समन्वय से अक्षर और शब्द बनते हैं। किसी धवनि या ध्वनियों को विशेष अर्थ में उपयोग किये जाने पर पर उस अर्थ में रूढ़ और सर्वमान्य हो जाती है। शब्दार्थ लोकमान्य हो जाने पर उसे अंकित करने के लिए आकृतियों का प्रयोग किया गया को कालांतर में वर्ण और वर्णमाला के रूप में विक्सित हुई। इसमें हजारों साल लग गए। वर्णों / अक्षरों का समन्वय शब्द के रूप में सामने आया। शब्दों के साथ विशिष्ट अर्थ संश्लिष्ट होने से शब्द भण्डार बना। शब्द-प्रयोग ने शब्द-भेद का विकास किया। क्रमश: भाषा का विकास होने से व्याकरण और छंद शास्त्र का जन्म हुआ।''  

भाषा वाहक भाव की, कहे सत्य अनुभूत 
संवेदन हर शब्द में, अन्तर्निहित प्रभूत 

रायपुर छत्तीसगढ़ से पधारी श्रीमती रजनी शर्मा 'बस्तरिया' ने छत्तीसगढ़ी भाषा में भावाभिव्यक्ति की - ''अपने भाषा अपनेच्च होथे, ऐमा जीवन भर बड़ाई है। दूसर के भाषा दूसरेच्च होथे, जेमा जीवन भर करलई है।' छगनलाल गर्ग विज्ञ सिरोही  राजस्थान ने मारवाड़ी बोली में संज्ञा-सर्वनाम  शब्दों के मूल स्वरूप उपबोलिओं में परिवर्तित होने के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनकी सार्थकता पर प्रकाश डाला। वक्ता ने शब्दों के उच्चारणों में ध्वनि परिवर्तन को स्वाभाविक तथा परिवेश व पर्यावरण के प्रभाव की भी चर्चा की। 

प्रो० रेखा कुमारी सिंह, ए.के.सिंह काॅलेज, जपला,पलामू ,झारखंड ने मगही तथा हिंदी भाषाओँ के भाषा के संज्ञा शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन कर अंतर पर चर्चा की। मगही में संज्ञा शब्द नाव नउआ, बीटा बिटवा, इतना एतना, जितना जेतना, मीठा मिठवा, पढ़ना पढ़नई, आदि बदलावों पर प्रकाश डाला। झंडा के स्थान पर समानार्थी पताका आदि का प्रयोग मगही का वैशिष्ट्य है। 

ब्रज भाषा की कुछ विशेष विशिष्टताओं पर प्रकाश डालते हुए नरेन्द्र कुमार शर्मा 'गोपाल' आगरा ने शौरसेनी से विकसित हुई बृज भाषा में 'अर्ध र' के प्रयोग की वर्जना का कारण माधुर्य में ह्रास को बताया। कृपा को किरपा। बृज को बिराज, ब्रह्मा को बिरमा, त्रिपुरारी को तिपुरारि, प्रमोद को प्रमोद, अमृत को इमरत, गर्भ को गरभ आदि किये जाने के पीछे वक्ता ने माधुर्य  को ही कारण बताया। इसीलिए श, ष का प्रयोग वर्जित है। इसलिए श्रीमान को सिरीमान, शर्बत को सरबत, विनाश को बिनास, षडानन को सदानन, दर्शन को दरसन के रूप में प्रयोग भी उच्चारण की तीक्ष्णता को कम करते हुए होता है।  

जबलपुर निवासी डॉ. मुकुल तिवारी ने मौखिक तथा लिखित भाषा रूपों में अंतर बताते हुए उनमें स्वर तथा लिपि की भूमिका पर प्रकाश डाला। भाषा के विकास में लिपि का विशेष महत्त्व है। अक्षरों, शब्दों, वाक्यों का विकास ही भाषा के रूप को बनाते हैं। स्वर, व्यंजन, उच्चार, अनुस्वार, विसर्ग आदि पर वक्ता ने प्रकाश डाला। 

दमोह से सहभागी बबीता चौबे 'शक्ति' ने बुंदेली के क्रिया पदों पर प्रकाश डालते हुए आइए आइए-आओ आओ, हाँ-हव, प्रणाम-पायलागू, क्यो-क़ाय, कहां गए थे-किते गै हते, उसको-उखो, नही-नईया, औरत-लुगाई, बेटी-बिटिया, बेटा-मोड़ा, चलो खाना खा लीजिये - चलो रोटी जे लेव, आज  ब्रत है - आज पुआस है, कल आएंगे - भयाने आहे के उदाहरण दिए। पूड़ी - लुचई, चावल - भात, दही बड़े - वरा आदि नए शब्दों की जानकारी वक्त ने दी तथा मधुर स्वर में भारत माँ के प्रति पंक्तियाँ प्रस्तुत कर वाणी को विराम दिया - 

मोरी सोन चिरइया लौट के आजा अपने देश रे
मोरी अमन चिरइया लौट के आजा अपने देश रे।

''हिंदी भाषा की उत्पत्ति,  विकास और भविष्य'' पर विचार व्यक्त करते हुए आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने हिन्द, हिंदी, हिन्दू शब्दों का उद्भव फ़ारसी से बताया। विद्वान वक्त ने हिंदी भाषा को देश की विविध देशज बोलियों का समन्वित रूप कहा। राजस्थयनी, बिहारी, पहाड़ी, पश्चिमी तथा पूर्वी भाषाओँ के सम्मिश्रण से हिंदी का विकास होने पर विस्तार से वक्ता ने प्रकाश डाला। प्रेम सागर में लल्लूलाल जी द्वारा प्रयुक्त हिंदी का अंश पाठ करते हुए वक्ता ने खड़ी बोली में रूपांतरण के कारकों की चर्चा की। मेरठ-बिजनौर में अंकुरित भाषा रूप उर्दू और हिंदी दो शाखाओं में बँट गई। कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, अवधी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, मैथिली, मगही, मेवाती, मारवाड़ी, हाड़ौती, मालवी, पूर्वी पहाड़ी, पंजाबी आदि को हिंदी की जड़ें बताते हुए वक्ता ने आधुनिक खड़ी हिंदी में इन बोलिओं के शब्द, मुहावरे, कहावतें आदि हिंदी में आत्मसात करने की आवश्यकता पर वक्ता ने बल दिया। 

पलामू के प्राध्यापक आलोकरंजन ने  ''नागपुरी का परिचय और उसका रूपात्मक संरचना'' पर विचार व्यक्त करते हुए भाषा को सरल-सुगम बनाने के लिए लिखित एवं मौखिक रूप में परिवर्तन की आवश्यकता वक्ता ने प्रतिपादित की।  आर्य भाषा परिवार की नागपुरी भाषा बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बंगाल आदि में बोली जाती है। नागपुरी की संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, भाववाचक संज्ञाओं आदि पर प्रो. रंजन ने चर्चा की। 

भाषा-विज्ञान पर्व की मुखिया, युगपरिधि उपन्यासकार प्रोफ़ेसर चंद्रा चतुर्वेदी जी ने ''ब्रजबोली के कतिपय शब्दों के पर्याय'' पर चर्चा की। शौरसैनी से व्युत्पन्न बृज के विविध रूपों का उल्लेख करते हुए विदुषी वक्ता ने कालिंजर के किलाधीश चौबे श्री रामकृष्ण जी कृत 250 वर्ष पुरानी कृष्ण विलास से पद्यांश प्रस्तुत कर उसकी व्याख्या विदुषी प्रो चंद्रा जी ने व्यक्त की। चौबे दरियाव सिंह के कवित्त सुनाते हुए वक्त ने लाड़ और रसमयता को बृज भाषा का अभिन्न अंग बताया। विश्ववाणीहिंदी संस्थान अभियान जबलपुर द्वारा ३१ दिनों से निरंतर दैनंदिन अनुष्ठानों को अभूतपूर्व बताते हुए उन्होंने इसकी उपादेयता को असंदिग्ध कहा। डॉ. मुकुल तिवारी द्वारा आभार ज्ञापन के साथ भाषा विज्ञान पर्व का समापन हुआ।

चंदा देवी स्वर्णकार ने भाषा द्वारा संप्रेषण की विधियों का उल्लेख करते हुए तत्सम-तद्भव शब्दों की विवेचना की। चंदा जी ने लोक साहित्य की अविरल धारा को उत्सव-पर्व से संबद्ध बताया तथा  बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी लोक भाषाओँ तथा भीली, गौंडी, कोरकू, आदि आदिवासी भाषाओँ संक्षिप्त का उल्लेख किया। 

''अवधी कहावतों में संज्ञा शब्दों का हिंदी में रूपांतरण'' पर रोचक चर्चा की इंजी. अरुण भटनागर ने। घर मां नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने, जबरा मारे रोबर ना दें, समर्थ को नहीं दोष गोसाईं, तिरिया चरित न जानें कोई आदि अनेक कहावतों में प्रयुक्त अवधी संघ शब्दों को हिंदी में परिवर्तित कर लोक ग्राह्य  बनाने पर अरुण जी ने प्रकाश डाला। 

कार्यक्रम के पाहुने अरुण श्रीवास्तव 'अर्णव' ने विविध बोलिओं की मिठास को समाहित करते हुए भाषिक विकास और परिवर्तन के मध्य सेतु स्थापन के प्रयास को सराहते हुए मालवांचल की आंचलिक बोली मालवी में लोकगीतों की परंपरा की चर्चा करते हुए वक्त ने शहरों में इसका प्रभाव कम होने पर चिंता व्यक्त की। खाना-जीमना, अच्छा -आछा, सारी-सगली आदि अनेक शब्दों की सरसता, सरलता और संग्रहण के प्रयास को भूरि-भूरि सराहते हुए अरुण जी ने विश्ववाणी हिंदी अभियान की सफलता की  कामना की। 

इस सारस्वत अनुष्ठान की पूर्णाहुति देते हुए मुखिया की आसंदी से डॉ. चंद्रा चतुर्वेदी जी ने विश्ववाणी हिंदी संस्थान द्वारा भाषा को केंद्र में रखकर सामाजिक समन्वय के प्रयास को अनुकरणीय निरूपित किया। अनुष्ठानों के संयोजक-परिकल्पक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', उद्घोषक प्रो. आलोकरंजन तथा वक्ताओं द्वारा व्यक्त विचारों का विश्लेषण नीर-क्षीर विश्लेषण कर विदुषी वक्त ने मुखिया की आसंदी की गरिमा वृद्धि की। डॉ. मुकुल तिवारी जबलपुर ने अनुष्ठान का समापन करते हुए सर्व सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

 

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