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अंतरंगता
June 8, 2020 • अशोक 'आनन '  • गीत/गजल

 
*अशोक ' आनन ' 
 
माचिसों से 
बारूदों की अंतरंगता -
ठीक नहीं लगती ।
 
समंदर सद्भाव का
अब लावे - सा -
उबल रहा ।
मौसम मुस्कानों का 
मशीनगनों को  -
मचल रहा ।
 
शोलों से
हवाओं की अंतरंगता -
ठीक नहीं लगती ।
 
सद्मावना के दीये भी
बुझकर -
उगलने लगे धुआं ।
आदमी को
ज़िंदगी लगने लगी -
मौत का कुआं ।
 
आंखों से
तिनकों की अंतरंगता -
ठीक नहीं लगती ।
 
सुबह से
रोज़ दिखते हैं वही -
घृणित चेहरे ।
अफ़सोस ! 
जिन्हें कर सके न नमन -
बहुतेरे ।
 
वसंत से
कौओं की अंतरंगता -
ठीक नहीं लगती ।
*मक्सी,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)
 

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