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अनजान रिश्ते
July 3, 2020 • सुरेश सौरभ • कहानी/लघुकथा
*सुरेश सौरभ
मैं उस टैक्सी से उतरा, वह भद्र महिला दो बच्चे लिए मेरे साथ उतरी, संयोग से एक टैक्सी में फिर हम बैठ गये। वह मेरे साथ खामोश बैठी थी, उसके दो बच्चे बार-बार अपने हाथ टैक्सी की विन्डो से निकालते हुए शैतानी कर रहे थे, मैं बार-बार उन्हें हल्के-फुल्के डांट देता, और वह भी बीच-बीच में अपने बच्चों को डपट रही थी। कुछ देर बाद मैं टैक्सी रुकवा कर उतरने लगा, वह महिला भी उतरने लगी। मैंने तेजी से दूसरी गाड़ी पकड़ने के लिए  अभी चंद कदम बढाए ही थे, तभी दिमाग में कुछ कौंधा, अरे! मैं तो पैसे देना भूल गया, मैं पीछे घूमा, तब तक वह औरत अपना भाड़ा देकर बढ़ी-अरे! आपने ने उनका पैसा नहीं दिया। टैक्सी वाला इस अंदाज में बोला जैसे मैं उसका शौहर हूं। वह झेंपते हुए बोली-वो मेरे साथ नहीं है। उस औरत का शरमीला चेहरा और ड्राइवर की बेबाकी के बीच मैं जल्दबाजी में उसकी ओर बढ़ते हुए अटकते हुए थोड़ा मुसकुराते हुए-अरे! अरे! मैं अपने पैसे दे रहा हूं। जल्दी-जल्दी में भूल गया।
मेरे चेहरे पर उभरे व्यंग्य लहजे और ड्राइवर की बेबाकी पर बगैर कुछ कहे अपने होंठ सिले वह जाती रही, किसी स्वचलित यंत्र सी। उसके कदमो में कोई खनक सी अब मेरे कानों को महसूस होने लगी, अब मैं उसकी आंखों की शरमो-हया पढ़ने को बेताब था, पीछे से उसे अधीरता से देखता रहा, अब मुड़े तब मुड़े, पर धीरे-धीरे मेरी आंखों से ओझल हो गई। जाने क्यों, जाने कैसी, अपनेपन की कोई कसक लिए मैं अपने गन्तव्य की ओर बढ़ता जा रहा था। यह कसक मासूम बच्चों के प्रति थी या उस महिला के प्रति या सामान्य शिष्टाचार के प्रति मुझे नहीं ज्ञात। शायद वह टैक्सी वाला ही मेरी कसक जानता हो, जो रिश्तो को भले न समझ पाया हो पर अपनेपन के अहसास को बाखूबी समझता था। अब अनजान रिश्तो की डोर मेरी पोर-पोर से बिन्धती जा रही थी। लिपटती जा रही थी।
*निर्मल नगर लखीमपुर खीरी
 

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