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ऐसे कहां हमारे भाग ?
July 1, 2020 • अशोक 'आनन'  • गीत/गजल
*अशोक 'आनन' 
 
मगरे पर आकर -
बोले    काग  ।
ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?
 
कच्चा         घर -
टूटा       खपरैल ।
जीना  ,   है    न  -
बच्चों का  खेल ।
 
बुझ  जाए - 
पेटों की आग ।
ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?
 
थिगड़ैलों      से -
तन   कैसे   ढाॅंकें ?
उनमें  से  अब -
यौवन      झाॅंके ।
 
चुनरी         में -
न  लागे  दाग़ ।
ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?
 
झांके    घर    की   -
हड्डी  -  पसली ।
घर से सपनों की -
अर्थी    निकली ।
 
डसें    कभी    न -
दुर्दिन  के  नाग ।
ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?
 
भूख़     -      पर्व
यों     बीते     हैं ।
आंसू   पी  -  पी -
हम   जीते    हैं ।
 
हमें    छोड़    दे  -
मौसम     घाघ  ।
ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?
 
चौंका  -    चूल्हा  -
बद    से    बद्तर ।
रीता     -
आटे का कनस्तर ।
 
फ़िर   उजडें    न  -
खुशियों के बाग ।
ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?
 
*मक्सी ,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)
 

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