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अब कोई अपना लगता ही नहीं
May 16, 2020 • राजीव डोगरा 'विमल • कविता

*राजीव डोगरा 'विमल

हे!ईश्वर
मैं कुछ खास नहीं
फिर भी
गुफ्तगू करता हूं तुमसे
दुनिया का हाल छोड़कर।

लोग पूछते हैं मुझसे
क्यों गुमसुम से रहते हो ?
क्या कोई दर्द मिला है ?
किसी अनजान शख्स से ?

अब क्या कहूं मैं
और कैसे कहूं
तेरी प्रेम अनुभूति
किसी से बोलने ही नहीं देती।

लोग पूछते हैं
क्यों तुम अजनबीयों की तरह
इधर-उधर घूमतें हो
अपनी फकीरी लिए।

मगर मैं कैसे कहूं
तुम्हारे सिवा मुझे
अब कोई
अपना लगता ही नहीं।

*राजीव डोगरा 'विमल',ठाकुरद्वारा

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