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आत्मनिर्भर तो पहले से ही हैं, लोकल के लिये वोकल बनना है
May 19, 2020 • सुशील कुमार 'नवीन' • व्यंग्य

*सुशील कुमार 'नवीन'

लोकडाउन 4.0 की शुरुआत से पहले प्रधानसेवक ने देश के लोगों को आत्मनिर्भर बनने का मंत्र दिया है। वैसे भी देश का शादीसुदा व्यक्तित्त्व पहले से ही आत्मनिर्भर हैं। उन्हें लगभग सभी कार्य अपनी ऊर्जा खर्च कर ही करने पड़ते हैं। ऐसे में उनके लिए तो इस मंत्र की पालना करना 'चुटकी बजाओ जिन्न हाजिर' जैसा है। भले ही आपको आज का विषय मजाकिया लगता होगा पर है गम्भीर। आत्मनिर्भरता की ओर सबसे तेज कदम इन्हीं लोगों के होंगे। देख लेना यदि यूं ही यदि लोकडाउन बढ़ता रहा तो बड़े-बड़े रिकॉर्ड ध्वस्त हो जाएंगे। 

हमारे एक अजीज मित्र है। बसेसर जी। वैसे तो मेरे सभी अजीज होते हैं। सबके दर्द की दवा मेरे पास ही होती है। ऐसे में मैं यदि अहिरावण की तरह पाताल में भी जाकर छिप जाऊं तो पवनपुत्र हनुमान की तरह खोज ही निकालेंगे। भले ही वो दूसरी कॉलोनी में रहते हों। पर मुझसे मिलने के लिए आते ही रहते हैं। लोकडाउन है इसलिए अब मुलाकात फोन के जरिये ही हो पाती है। शनिवार सुबह फोन आया। राजी खुशी जान मुद्दे पर आ गए। बोले-शर्मा जी!ये लोकल को वोकल कैसे बनाना है। मेरे तो कुछ समझ में नहीं आया। मैंने कहा-जब ये आपदा आई तो सबसे ज्यादा मददगार कौन बनें। रात के दो बजे भी यदि किसी वस्तु की जरूरत पड़ी तो किसने दी। सब्जी-दूध सब्जी किसने लाकर दिया। बोले-पड़ोसी दुकानदारों ने सामान दिया। लोकल दूधियों ने दूध और रेहड़ीवालों ने सब्जी घर बैठे ही पहुंचा दी। मैंने कहा-आप तो राशन ब्रांडेड रिटेल मार्ट से लाते थे। दूधियों का दूध आपको अच्छा नहीं लगता था। उसमें से बैक्टरिया दिखते थे। रेहड़ीवालों से सब्जी खरीदने में आपको शर्म आती थी। मुसीबत आई तो सब भूल गए। बोले-तो क्या करते। बीमारी ही ऐसी आई है। विश्वास तो जानने वाले पर ही हो सकता है। अननोन पर कैसे विश्वास करें। मैने कहा-तो अब इन्हीं लोकल को वोकल बनाओ। मतलब जो हमारे सुख-दुख में काम आता हो, उसी को मजबूत बनाओ। ताकि वो फिर हम जैसों के काम आ सकें। बोले-चलो, ये बात तो समझ में आ गयी कि देशी ही काम आएंगे। पर ये आत्मनिर्भरता वाली क्या बात है। इस बारे में भी बताओ।

मैंने कहा-आप तो पहले से ही आत्मनिर्भर हो। आप तो इसी प्रकार लगे रहो। बोले-मजाक मत करो। सीधा समझाओ। मैंने कहा-देखो! प्रधानसेवक जी ने आत्मनिर्भर देश की मजबूती के पांच पिलर बताए हैं। पहला इकोनॉमी, दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर, तीसरा सिस्टम, चौथा डेमोग्राफी और पांचवा डिमांड और सप्लाई । अब इसे इसी रूप में समझो। इकोनॉमी आपकी पहले से ही सुरक्षित है। तनख्वाह आते ही उसे आप भाभीजी को सौंप फ्री हो जाते हो। आर्थिक संकट को संभालना उन्हीं का काम है। आप तो झट से ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हो कि इसी से काम चलाओ। 

दूसरा पिलर है इंफ्रास्ट्रक्चर। यहां भी भाभी जी का योगदान अविस्मरणीय है। बुरे वक्त के लिए न जाने कहां-कहां उन्होंने धनराशि छुपा रखी होगी। नोटबन्दी के समय भी तो 500 के नोटों की चार गड्डियां मिलने पर आप बाग-बाग हो गए थे। 

तीसरा पिलर है हमारा सिस्टम। आपके घर का सिस्टम पहले से ही ओके है।घर में आपकी जो ड्यूटी है उसे पूरा करना आपका नैतिक धर्म है।यही वजह है कि आपके यहां झगड़ा नहीं होता है। गर्म पानी न मिले तो ठंडे से नहा लेते हो।बिना कहे झाड़ू मार देते हो। सुबह और शाम की चाय आप ही के हाथों से अच्छी बनती है। वाशिंग मशीन में मैले कपड़े डालना, सर्फ डालना, उसे स्टार्ट करना भी आप ही को आता है। कमी की गुंजाइश है ही नहीं।

चौथा पिलर है वाइब्रेंट डेमोग्राफी। ये पिलर भी आपका पहले से ही मजबूत है। घर के लगभग सभी काम आपके ही करकमलों से होते हैं।ऐसे में सभी आपसे खुश भी रहते हैं। जिस तरह लोकतंत्र हमारे देश की ताकत है। उसी प्रकार सर्वपालनहारी का आपका व्यक्तित्व आपके परिवार की ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है।

पांचवां पिलर है डिमांड और सप्लाई। यहां भी आपको कोई विशेष पालना की जरूरत नहीं है। सुबह से शाम तक आप सभी की डिमांड पूरी करते ही रहते हो। पत्नी कहती कि चाय आप ही अच्छी बनाते हो। सब्जी की डिमांड बच्चों की होती है। मेहमान आये तो प्याज-टमाटर की चटनी आपके ही हाथों की चाहिए। सप्लायर तो आप बेस्ट क्वालिटी के हो ही।मेरे इस लघु व्याख्यान को वे बिना कुछ कहे सुनते रहे। जब मैंने यह कहा कि समझ गए क्या। बोले-आप भी न अजीब आदमी हो। किसी का घर मत बसने देना। बात यहां देश की थी और आप इसमें भी चटखारे ले रहे हो।काम तो आप भी वही करते हो। बस उदाहरण हमारा देते हो। हमारा ही तीर हमारी तरफ मोड़ ज्ञानवर्धन के लिए धन्यवाद कह उन्होंने फोन काट दिया। बात उनकी सही ही थी। रसोई में रखा सीताफल और कच्चा आम दोपहर के भोजन के लिये हमारा इंतजार कर रहा था।

*सुशील कुमार 'नवीन' , हिसार

 

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