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आस्था की लाली
September 29, 2020 • ✍️कीर्ति शर्मा • कहानी/लघुकथा

✍️कीर्ति शर्मा

मेरी पत्नी, उससे शादी करके सही चल रहा था। हम दोनों हंसी - खुशी के माहौल में अपनी घर - गृहस्थी चला रहे थे। मैं ऑफिस जाता तो मेरा टिफिन लेकर खड़ी रहती। शाम होते ही मेरे इंतजार में खड़ी रहती। मेरे आते ही मुझे चाय देना, प्यार भरी बातों के साथ मुझसे ऑफिस के समाचार पूछना, अच्छा - अच्छा खाना बनाना। घर स्वर्ग जैसा लगता था। इस बीच हमारे घर में एक नन्ही  मेहमान, मेरी बेटी आ गई। उसका नाम गुड़िया रखा। अब तो घर में खुशियां ही खुशियां थी, लेकिन कहते हैं ना खुशियों को किसी के साथ बाटना नहीं चाहिए, नजर लग जाती है।  ऐसा  ही कुछ हमारे घर में भी हुआ। 

पूनम एक दिन किसी संत - महात्मा से मिली और सब बदल गया पहले जब उसने मुझे उनके बारे में बताया, मैंने बहुत ही नॉर्मल लिया और टाल गया लेकिन धीरे-धीरे पूनम में बदलाव आने लगे। वह घर - परिवार पर ध्यान देने की जगह दिनभर पूजा अर्चना में लगी रहती।  सुबह - सुबह नहा कर पूजा करने बैठ जाती दूरी  रखने की कहती।  इन सब बातों से मुझे परेशानी हो रही थी। मैं समय पर सब छोड़ कर चुप था, लेकिन मेरी चुप्पी ने सब पूजा-पाठ अर्चना के रूप को और बढ़ा दिया था।

अब  दिनभर  घंटी की आवाज़ सुनाई देती। अपने घर के कामों को तिलांजलि देकर , पूनम  पूजा करती रहती।  घर में हवन कराती,और अपने पति और बेटी पर ध्यान नहीं दे रही थी। इन सब बातों से मेरा गुस्सा बढ़ गया और मैंने एक दिन पूनम को बहुत डांटा।  उसके बाद में ऑफिस चला गया। पूनम को मेरा डांटना अच्छा नहीं लगा और वह मेरे घर आने से पहले घर छोड़कर अपने पीहर चली गई।  जब मैंने घर आकर पूनम और गुड़िया को आवाज दी तब पता चला कि वह घर छोड़कर जा चुकी है। खाना खाकर सोने जा रहा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी।  मैं बिस्तर छोड़कर बाहर निकल गया। घूम कर आने के बाद सो गया। पूनम के ना  होने पर घर पर  नाश्ता करने का भी मन नहीं हुआ। कहीं से कानों में मंत्रों की आवाज नहीं आ रही थी। एक अजीब सी शांति चारों ओर फैली हुई थी। कहीं पर अगरबत्ती - धूप की सुगंध भी नहीं थी। मैं घबरा गया और तेजी से तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल गया।  

सात-आठ दिनों के पश्चात मुझे लगने लगा शांति कितनी अशांति को पैदा करती है। पूरे घर का खालीपन मुझे कचोटने लगा। मेरे विचारों का क्रम टूट गया। घड़ी में रात के 2:00 बजे की टिक - टिक की आवाज़ आ रही थी। चौकीदार भी “जागते रहो” की आवाज से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। मैंने सोने की चेष्टा की लेकिन सफल नहीं हो पाया। अचानक मेरे मन में विचार आया कि मैं पूनम की स्वतंत्रता में बाधा बन रहा था।  ईश्वर ने सबको अपने विचारों के साथ पैदा किया और मैं उसके विचारों में अपने विचार क्यों लगा रहा था। ईश्वर ने जिसे जैसे बनाया है, हम उस चीज को वैसे ही स्वीकार करते हैं, पत्नी को क्यों नहीं।  वह पूजा-पाठ घर के हित के लिए ही कर रही थी।  मुझे उसके विचारों के साथ सम्मिलित होना चाहिए था और अगर कुछ गलत लग भी रहा था, तो बात करके सुलझाया जा सकता था। मैंने यह सब विचार कर पूनम को मायके से लेकर आने का निर्णय लिया। 

सुबह पांच बजे की गाड़ी थी। मैं ठीक से सो भी नहीं पाया और उठकर स्नान करके तैयार हो गया। घड़ी  में  चार बज रहे थे, मैं स्टेशन जाने के लिए तैयार हो चुका था।  घर के खिड़की दरवाजे बंद कर मुख्य द्वार खोलते ही मेरी आश्चर्य में पड़ गया।

“पूनम , गुड़िया तुम आ गए ? मैं तुम्हे लेने तुम्हारे मायके ही आने वाला था।”

पूनम के आँखों में आंसूं थे।  उसने गुड़िया मेरी गौड़ में दी और बोली, “सॉरी, अमर। मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें बहुत दुख दीया है। इतने दिनों में मैंने अनुभव किया कि पूजा-भजन सब मन की शांति,  सुख व परिवार के लिए होता है। मेरी पूजा से घर में शांति नहीं अशांति उत्पन्न हो रहे थी।  तो ऐसी पूजा किस काम की। सच में मैं पूजा नहीं करूंगी।”

“ ऐसा मत कहो पूनम।  पूजा करो लेकिन, पूजा - भजन के आगे भी जीवन की सच्चाई  विद्यमान है उन्हें भी जानने की कोशिश करो।  यह अंतिम सीढ़ी नहीं है। “मैंने कहा। 

“ घर में आने की नहीं कहोगे ?”पूनम ने कहा। 

“तुम्हारा ही घर है।  अंदर आओ.”  मैंने घर के अंदर सारे खिड़की दरवाजे खोल दिए कमरे मैं सुबह की बयार भरने  लगी थी। आसमान पर प्रातः की लाली भी चमकने लगी थी। 

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