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आसान नहीं है विलक्षण शब्दों के मायाजाल से निकलना
May 22, 2020 • सुशील कुमार 'नवीन' • व्यंग्य

*सुशील कुमार 'नवीन'

आप भी सोच रहे होंगे कि आज यह किस तरह का विषय है। वैसे तो हास्य में ज्ञान प्रदान करना कोई नई बात नहीं है। देवलोक से लेकर पृथ्वीलोक तक ज्ञान प्रदान करने वालों की कोई कमी नहीं हैं।लोकडाउन में विलक्षण शब्दों के मायाजाल ने हमें पूर्ण रूप से अपने घेरे में लिए रखा है। दूरदर्शन रामायण, महाभारत,विष्णु पुराण, उपनिषद गंगा, शक्तिमान ने विशुद्ध हिंदी का ज्ञानवर्धन किया है । अब ये ज्ञानवर्धन आने वाले समय में क्या दिक्कतें खड़ी कर सकता है, इस पर भी चिंतन जरूरी है। 

लोकडाउन में लोग बोर न हों। मनोरंजन के साथ ज्ञानवर्धन भी हो इसके लिए दूरदर्शन ने इस बार कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। रामायण,महाभारत का प्रसारण समाप्त हो चुका है। मानस पटल पर इनका प्रभाव लम्बे समय तक रहेगा इसमें कोई दो राय नहीं है। माता श्री, पिता श्री, पितामह,भ्राताश्री,ज्येष्ठ श्री, भगिनी,अनुज, अनुजपुत्र,कुलवधू, पार्थ आदि सम्बोधन समाज मे पुनर्जीवित से हो गए हैं। किंचित, कदापि, कदाचित,अनुगृहीत,आतिथेय, तिलांजलि, अनधिकृत,अक्षौहिणी,संवर्धन, सूक्ष्म, अनुकूल प्रतिकूल, विपरित, यशस्वीभव:, आयुष्मान भाव:, विजयी भव:,मनोगत,मर्मघाती,महत्वाकांक्षा, मुखारविंद, अंत:करण,अनुसरण,परिप्रेक्ष्य, मनोज्ञ अनुग्रह,अनभिज्ञ आदि और भी बहुतेरे शब्द हैं जो हमारे मस्तिष्क में घूमते रहेंगे। हालांकि इन शब्दों का चलन हमारे ऊपर ही निर्भर है कि हम इन्हें कब तक प्रयोग करेंगे। वैलएजुकेटेड इंडियन वुमन कप मॉम,मम्मी की जगह मां, माताश्री संबोधन जंचेगा या नहीं। इंग्लिश मीडियम स्कूल में जाने वाले बच्चों से माता जी प्रणाम, विद्यालय जाने की आज्ञा दें, आपकी आज्ञा हो तो मैं अपने भातृजनों के साथ किंचित काल के लिए क्रीड़ा का आनन्द ले आऊं, आज भोजन में क्या बना है माताश्री आदि सम्बोधन सुन पाएंगे। 

दिक्कत तो तब होगी लोकडाउन खुलने के बाद ये बच्चे जब स्कूल जाएंगे। हिंदी के शब्दों पर सौ फीसदी लगाम कसने वाले स्कूलों में जब बच्चे आचार्य प्रणाम, गुरुमाता अभिवादन स्वीकार करें। बेंच की जगह कुश आसन और बन्द कमरों की जगह खुले वातावरण में विद्या अध्ययन की मांग होगी। वाटर कूलर की जगह मटके का पानी पीने की जिद करेंगे। कोट पैंट टाई की जगह विद्यालय में ब्रह्मचारी वेशभूषा धारण करने पर जोर देंगे। विद्यालय प्रबंधन के लिए दो माह तक घरों में ब्रह्मचारी सा जीवन व्यतीत करने वाले इन बालमनों को पुरातन से आधुनिक विचाधारा में वापस लेकर आना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। 

यही नहीं लंबे लोकडाउन के बाद कार्यालयों में कर्मचारी लौटेंगे तो भी अजीब सिचुएशन बनेगी। बिना नकद नारायण काम की तरफ नजर भी न करने वाले बाबू अपना तरीका बदलते दिखेंगे। अब सबसे पहले वे हस्त प्रक्षालन करवाएंगे।फिर परिवार, गांव की कुशलक्षेम जानेंगे। मिलने वालों को लगेगा कि लोकडाउन ने इनका ह्रदय परिवर्तन कर दिया है। इसके बाद सीधे मुद्दे पर आ जाएंगे। रामायण के राम सी मोहक छवि चेहरे पर धारण कर कहेंगें- अनुज जरा विश्राम कर लों। कंधे पर धारण किए इस बैग रूपी धनुष को मुझे दे दो। ताकि मैं इसकी उचित तरीके से जांच कर प्रत्यंचा चढ़ा दूं।तूणीर रूपी जो लंच बॉक्स लिए हो उसे भी मुझे दे दो।ताकि प्रसाद समझ मैं इसे विधिवत ग्रहण कर सकूं। आगन्तुक ने उनके निवेदन को स्वीकार कर लिया तो ठीक अन्यथा उनका सौम्य चेहरा दावानल सा रूप धर लेगा। माथे पर क्रोध की लपटें साफ दिखेंगी। कहेंगे-मूर्ख राक्षस। मैंने तुम्हें अपनी भूल सुधारने का एक मौका दिया था। तुमने मेरे निवेदन को अस्वीकार कर स्वयं काल को निमंत्रण दिया है। अब भुगतो।

लोकडाउन समाप्ति के बाद पत्नी का रूप भी बदला मिलेगा। यहां माहौल उलट होगा। सीधे सपाट अंदाज में विनम्रतापूर्वक आदेश होगा।बहुत दिन हो गए प्रिये हम बाहर कोई चलचित्र देखकर नहीं आ पाए है। स्वादिष्ट भोजन का भी रसास्वादन किए बहुत समय हो गया है। आपकी आनाकानी पर राक्षसी सी भौहें तन जाएंगी। खुले तौर पर युद्ध निमंत्रण स्वीकार करना आपके हित में नहीं होगा। ऐसे में यह कहकर ही पीछा छुड़ाना होगा। प्रिये! ऐसा हो सकता है कि तुम्हारा निवेदन मैं अस्वीकार कर दूं। कहने की बात ये है कि लोकडाउन समाप्ति के बाद दो से तीन माह हमारे लिए भी अभूतपूर्व होंगे। हालांकि समय के साथ साथ परिवर्तन सम्भव है। फिर भी इन विलक्षण शब्दों के मायाजल से निकलना हमारे लिए आसान नहीं रहेगा।

*सुशील कुमार 'नवीन' , हिसार

 

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