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आलस्य का आशियाना
June 4, 2020 • रश्मि वत्स • कविता


*रश्मि वत्स

आलस्य का ठिकाना,
हर घर में है इसका आशियाना ।
रही, सही कसर इसकी
मोबाइल ने है पूरी करदी ।

खाते,पीते ,उठते बैठते ,
मोबाइल के हम संग रहते ।
और कुछ करने में मन भाए
फेसबुक, टिकटोक हमें रिझाये ।

चाय ,नाश्ता चाहे हो भोजन,
बिन इसके सब लगते बेमन ।
पड़े-पड़े बिस्तर पर अब तो
आराम ही आराम में लगता है मन ।

सुनते रोज़ माँ की डांट दिनभर ,
उठो समय से ,कुछ कर लो तन-मन।
क्या रख्खा है इन सब में माता ,
कहकर ये आलस्य है भाता ।

काम काज में क्या रख्खा ,
सुख तो आराम में पक्का ।
खाओ पिओ मौज उड़ाओ
सुनकर सब रह गए हक्का बक्का।

आलस्य में जो समय गवायें,
सर्वनाश उसका हो जाए ।
समय रहते इसको जो दूर भगाए,(भगाएँ)
तो निश्चित कर्म फल वो पा जाए ।(जाएँ)

चुस्ती, फुर्ति अब ले आओ ,
आलस्य को अपने दूर भगाओ ।
गांँठ बाँंध लो तुम ये यारों
समय रहते अब सुधर भी जाओ ।
*मेरठ (उत्तर प्रदेश)

 

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