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आकर रुलाता है
December 26, 2019 • विजय कनौजिया • कविता


*विजय कनौजिया*
ठिठुरती ठंड में यादों का
मौसम भी सताता है
जिन्हें माना सदा अपना
वही आकर रुलाता है..।।

भुलाए याद न भूले
चाह कर चाह न भूले
करूं कितना जतन फिर भी
न वो यादों से जाता है..।।

मनाना चाहूं खुद को मैं
मगर माने नहीं ये दिल
मिले साथी बहुत अब तक
न कोई और भाता है..।।

चलो सृजन करेंगे प्रेम के
कुछ और ऋतुवों का
मान जाए काश ये दिल
न जाने क्यूं घबराता है..।।

ठिठुरती ठंड में यादों का
मौसम भी सताता है
जिन्हें माना सदा अपना
वही आकर रुलाता है..।।
वही आकर रुलाता है..।।

*विजय कनौजिया
ग्राम व पत्रालय-काही
जनपद-अम्बेडकर नगर (उ0 प्र0)

 
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