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आकांक्षा युक्त मनुष्य ही मानव शेष नहीं
April 19, 2020 • डॉ० सिकन्दर लाल  • लेख

*डॉ० सिकन्दर लाल 

तुच्छ व्यक्ति वह होता है जिस मनुष्य को धन-दौलत के प्रति कामना होती है आकांक्षा नहीं, क्योंकि कामना के वशीभूत व्यक्ति को कितना भी अधिक धन-दौलत, रूप-सौन्दर्य, पद-प्रतिष्ठा आदि मिल जाए उसको अपने जीवन में कम ही लगता है इसलिए उसे कभी भी अपने जीवन में सुख-शांति नहीं मिल पाती और वहीं दूसरी ओर आकांक्षा के वशीभूत व्यक्ति को अपने जीवन में ईमानदारी से मिले हुए धन-दौलत, रूप-सौन्दर्य, पद-प्रतिष्ठा आदि जो भी मिल जाए उसी में उसको बहुत अधिक सुख-शांति मिलती है,क्योंकि वह भोले-भाले मानव को, धर्म, मंदिर-मस्जिद- चर्च-गुरुद्वारा, पूजा-पाठ,कथा-भागवत, सरकारी गैर-सरकारी नौकरी दिलाने, मानक से अधिक स्कूल-काॅलेज की फीस,नकल कराने,पास कराने, दान, भगवान् की मूर्ति,गौ,माँ गंगा,जाति , घूसखोरी आदि के नाम पर ठगकर मंहगी गाड़ी,बड़ा मकान, अपने पुत्र-पुत्रियों की मंहगी शादी-विवाह आदि की कामना कुछ मूर्ख की तरह,उसके (आकांक्षा युक्त मानव) मन में नहीं होती बल्कि उसके ईमानदारी की कमाई में जो कुछ भी ईश्वर प्रसाद स्वरूप देते हैं वह उसी में प्रसाद अर्थात् प्रशन्न रहता है। इसलिए मनुष्य को अपने मन, वाणी एवं कर्म में जीवन पर्यन्त आकांक्षा रखनी चाहिए न कि मूर्ख एवं पाखंडी मनुष्य की तरह कामना,क्योंकि कामना मनुष्य के जीवन में दु:ख देती है और आकांक्षा मनुष्य के जीवन में सुख-शांति की वृद्धि करती है। आकांक्षा से युक्त मनुष्य ही मानव कहलाता है और मानव ही सही मायने में रामनवमी को मनाते हैं। राम का अर्थ ही है अपने निर्माता में रम अर्थात् समा जाना। राम में समा जाने के बाद फिर मानव के मन, वाणी एवं कर्म में किसी भी प्रकार की कामना (प्रेय पदार्थ अर्थात् काम, क्रोध, मद लोभ, दम्भ,दुर्भाव,द्वेष ) आदि की भावना नहीं रह जाती है| फिर वह मानव ,अधिकतर मूर्ख एवं पाखण्डी मनुष्यों द्वारा भोले-भाले मानव को धर्म के नाम पर झूठ-मूठ का प्रवचन देकर ठगने हेतु ,जमीन कब्जा करके और उसमें बनाये गये मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा आदि में, न जाने के बजाय ,वह ईश्वर द्वारा निर्मित संसार रूपी धाम में विराजमान् मानव एवं जीव-जंतु रूपी मूर्तियों की अपनी क्षमतानुसार सेवा-सुरक्षा में लगा रहता हुआ मानो जीवन पर्यन्त रामनवमी को मना रहा है जैसे कि परमज्ञानी सन्त तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं कि-
   नाथ सकल संपदा तुम्हारी।
   मैं सेवक समेत सुत नारी।।
   सीय राममय सब जग जानी।
   करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
  
  *डॉ० सिकन्दर लाल  (उत्तर प्रदेश)

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