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आज भी मुद्रित शब्द की अपनी ठसक है
November 7, 2019 • शब्द प्रवाह • समाचार

बिलासपुर। पुस्तक मेले में आज वर्तमान परिदृश्य पर इंटरनेट के दौर में शब्द की भूमिका परिचर्चा का आयोजन किया।
परिचर्चा से पूर्व राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,भारत के हिंदी संपादक डॉ ललित किशोर मंडोरा ने कहा कि आज हम पुस्तकों की दुनिया में हर बाधाओं को पार करने में सक्षम है।न्यास जहां पुस्तकमेलों का आयोजन कर रहा है,और दूसरी तरह रचनाकारों से नियमित सम्वाद कार्यक्रम कर रहा है वही ई पुस्तक के क्षेत्र में भी कदम बढ़ा चुका है।न्यास के अध्यक्ष व निदेशक भी यही चाहते है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में न्यास की गतिविधियों की जानकारी पाठकों तक पहुंच सकें।इसी के साथ डॉ मंडोरा ने पुस्तक प्रेमियों को आगामी नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले की जानकारी से भी अवगत कराया।
सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार श्री नथमल शर्मा ने की।
पहले वक्ता के तौर पर अजय शर्मा ने अपनी बात कहते हुए इस बात पर जोर दिया- रचनात्मकता का बहुत असर पड़ता है,आम जिंदगी में,जैसे किसी कम्पनी का कोई विज्ञापन आता है और वह अचानक से सबकी जुबान पर चढ़ जाता है।आज नेट मार्केटिंग में मान्यता टूट रही है अब नेट ने व्यापार को भी काफी हद तक बदल दिया है।फेसबुक के माध्यम से मार्कजुकर ने अदभुत करिश्मा पैदा कर दिया है।गांव देहात से लेकर महानगर तक सभी आज सोशल मीडिया से जुड़ गया है।आज इस माध्यम का दुरुपयोग भी हो रहा है जिसका सावधानी से  उपयोग करने की आवश्यकता है।
संदीप गुप्ता ने कहा:पहले बच्चे मिट्टी में खेलते थे,आज इंटरनेट पर खेलने लगे है।खेलकूद के नाम से आज बच्चे जहां कतराते है वहीं कम्प्यूटर पर गेम खेलना पसन्द करते है।बहुत कम बच्चे आज फील्ड में जाना पसंद करते है।
आज कम्युनिकेशन के साधन बढ़े है लेकिन भाषा में कंजूसी करना सीख गए।जैसे आजकल टेक्स्ट मीडियम की भाषा देखने लायक है।
वीरेन्द्र गहवई ने कहा-आज भी कबीर दास की बातों का असर समाजिक सरोकारों पर उसकी समाजिक चेतना में देखने को मिलता है।आज हम ने शब्दों को अपने मन मुताबिक बदलना शुरू कर दिया है।नेट ने आने के बाद अपना जाल फैला दिया।आज गूगल ने लिखने की आजादी भी आमजन से छीन ली,आप बोल कर अपनी बात टाइप कर लेते है।गूगल ने जहां अपने उपयोग का फैलाव किया है वही युवा पीढ़ी ने उसका दुरपयोग भी किया है।इनसे बचने की आवश्यकता है।अपने को अपडेट करने का नजरिया आज इंटरनेट है।आज पॉजिटिव होने की आवश्यकता है।

विसवेश ठाकरे ने अपनी बात रखते हुए कहा-आयोजकों से पहले मैं शब्दों का शुक्रगुजार होना चाहता हूँ।
आज शब्दों के ख़त्म हो जाने का खतरा मंडरा रहा है।आज लिखने की आदत छूटती जा रही है।आज इमोजी का प्रचलन ज्यादा होने लगा है।आज यह गम्भीर और भयावह स्तिथि है।इंटरनेट ने शब्दों का विस्तार तो किया है आज संचार तो हो रहा है केकिन सम्वाद नहीं हो रहा है।आज सम्वाद आमजीवन से गायब होता चला जा रहा है।आज इंटरनेट सम्वाद सिस्टम को पूरी तरह से ध्वस्त कर रहा है।
आज उत्सवधर्मिता का माहौल इंटरनेट खत्म कर रहा है।आज घर बैठे हम सामान मंगवा लेते है बाजार नहीं जा पाते।इस समस्या से उबरने की आवश्यकता है।हमें वही दौर चाहिए जो दुबारा से हमें अपनों से जोड़ सकें,हमसे जुड़ सकें।
रायपुर से पधारी प्रियंका कौशल ने कहा-

जैसे हीरा महंगा होता है उसी प्रकार यहां के श्रोता भी कम है लेकिन विषय बेहद रोचक है।पर गंभीर श्रोताओं को देख आनंदित भी हूँ।शब्द अकेला नहीं आता,वह अपने साथ शक्ति लेकर आता है।रोजमर्रे के जीवन से जुड़े कई प्रसंगों को रेखांकित करते हुऐ प्रियंका ने अपनी बात रखी।शब्दों की भूमिका गहरी है।शब्द भी कभी नष्ट नहीं होते,वे अत्यंत बलशाली है।उत्थान व पतन में शब्द की भूमिका रहती है।यही शब्द ही है कि आज भी हम गांधी व विवेकानंद को पढ़ते है।
आज शब्दों की भूमिका का विध्वंस काल है।इससे बचने की आवश्यकता है।

डॉ गोपा बागची,प्रोफेसर पत्रकारिता केंद्रीय विश्विद्यालय, छत्तीसगढ़ ने कहा: आज इंट्रक्शन की बात इंटरनेट ने खत्म कर दी है।केवल और केवल सूचनाओं का आदान प्रदान मात्र रह गया हैं।केवल शब्दों का ही प्रयोग हो रहा है।भाषा के उपयोग में कंजूसी बरतने लगे जिसमें आज कुछ राष्ट्रीय स्तर के चैनल्स भी है।आज कुछ अखबार भी है,हैरानी होती है कि वे क्या परोसना चाहते है! बेहद चिंतनीय क्षण है।

परिचर्चा के अध्यक्ष नथमल शर्मा ने कहा :आज इंटरनेट नितांत आवश्यक उपकरण है।अब तो उसमे बहुत सारे वर्ग उसमें आ गए है।आज फीलिंग की बात है।
उसके सारे खत आज मै दरिया में बहा आया हूं।अब तो चिट्ठियां आती नहीं,बालस्वरूप रही की कुछ पंक्तियां गुनगुनाते हुए उन्होंने कहा कि आज देखना यह है कि आप किस फीलिंग से वह बात रख रहे हैं।अजगर वजाहत की छोटी रचनाओं का जिक्र भी किया।शब्द का मर्म जो समझ जाए,वह काबिल है।शब्द की बात यदि हम करें तो उसकी भावना को समझने की बात है।आज सूखा दौर है उसमें आत्मीयता की आवश्यकता है।
आज भी त्योहारों पर ग्रीटिंग कार्ड का मूल्य में समझता हूं।यानी मुद्रित शब्द की अपनी ठसक है।अब न बिटिया का पत्र आता है ना ही मामा का।यदि संदेश आते है तो गेलरी न भर जाए,उनको डिलीट कर दिया जाता है।फिर से संवाद की आवश्यकता है।अब चीजें तेजी से बदल रही है।इंटरनेट ने सम्बन्धों को ड्राई के दिया है ।आजकल मैं लोगों से बात करता हूं तो उनके पास भी कहने समझने को कुछ विशेष नहीं मिलता।याद करिए कि हम में से कितने लोगों ने मिट्टी का स्पर्श किया,!
आज माली को निर्देश जरूर देते है,लेकिन खुद मिट्टी को हाथ नहीं लगाते यदि कोई व्यक्ति जिंदगी से चला जाता है तो हम श्मशान घाट में चले गए तो मिट्टी को हाथ लगा लिया बस।हमारे जीवन से संजीदगी,अपनापन गायब होता चला गया है।

उल्लेखनीय परिचर्चा में  पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी,विनय पाठक,द्वारिका प्रसाद अग्रवाल भी शामिल हुए।

 

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