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 संस्कार
November 5, 2019 • माया मालवेन्द्र बदेका • कहानी/लघुकथा

*माया मालवेन्द्र बदेका*
 
'दीदी आप भजन गाइये ना, कितना अच्छा गाती है'। सरला जी उसे देख मुस्कुराई कुछ बोली नहीं।
 
वह अभी इस शहर में नई नई आई थी। धीरे धीरे पास पड़ोस से परिचित हो रही थी। सामूहिक मायका और सामूहिक ससुराल परिवार की आदी, वह सभी को अपने घर जैसा मानती थी।
 
कभी भजन कभी कथा कभी कुछ और कार्यक्रम में आपस में मिलने लगे। उसको सभी के साथ मिलकर अच्छा लगा और सभी ने प्यार से  उसे अपनाया।
 
उसकी उम्र से बड़ी कई महिलाएं थी, वह उनका सम्मान करती थी। ऐसे ही स्वभानुसार उसने आज भी कह दिया 'चलिए दीदी आप सब आज हमारे यहां चाय बनाती हूं।आप सभी का आना नहीं हुआ अब तक। एक दो छोटी थी वह कुछ नहीं बोली, लेकिन जिन्हें दीदी कहकर सम्बोधित किया, वह एकदम तमतमा गई और बोली-'यहां दीदी कोई नहीं सबका नाम लेकर बुलाया कीजिए। हम बुढ़ा नहीं गये है।'
वह हतप्रभ थी की बड़े  लोग प्यार और सम्मान की कद्र करते हैं, यहां तो उल्टा ही था। वह बहुत मायूसी से बोली- यह मुझसे नहीं होगा। मेरा स्वभाव,मेरे संस्कार,मेरी मर्यादा में नहीं छोड़ सकती। आप सबको अच्छा नहीं लगता कोई बात नहीं।
 
लेकिन आप सब अच्छी तरह जानते हैं उम्र का तकाजा आधुनिकता से, विचार से,आडम्बर से नही रूकता। हम कभी तो किसी से बड़े होंगे और बुढ़े भी। इतना सा कह दोनों हाथ जोड़कर अपने घर आ गई।
 
*माया  मालवेन्द्र बदेका,उज्जैन (मध्यप्रदेश)
 

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