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 हायकू
July 4, 2020 • अंकुर सहाय 'अंकुर' • दोहा/छंद/हायकु
*अंकुर सहाय 'अंकुर'
 
थकती हुई 
विचरण करती
थी एक आशा ।
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उसने कहा
"आप तो ऐसे न थे"
मैं हतप्रभ ।
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दुनिया माने
नज़र से गिरा है
आदमी नहीं ।
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संकट काल
फैला कोरोना जाल 
हाल  बेहाल ।
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हम भी चुप
अब कैसे हों बातें
तुम भी चुप ।
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वक्त के साथ
थामना तो चाहा था
तुम्हारा हाथ ।
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किसने माना
रेत की दीवार सा
 है ढह जाना ।
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पेट है खाली
पीटने वाले पीटें
वक्त की थाली ।
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गली न दाल
बदलते ही रहे
अपनी चाल ।
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बना ही डाले
चिड़ियों ने घोसले
क्या करे आंधी ।
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गांधी के राम
आज हो गए आम
किस्सा तमाम ।
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हे मेरे राम !
जीवन की है शाम
नहीं आराम ।
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सबने देखा
बंधी हुई मुट्ठी में
बन्धक रेखा ।
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नयी सुबह
तू चुप मत रह 
अपनी कह ।
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बोते हैं आंसू
काटते हैं मुस्कान
नई उम्मीद ।
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आओ रच लें
एक नई गीतिका
प्यारी वीथिका ।
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ठंड में पड़ा 
देश का सच्चा भक्त 
गर्म है रक्त ।
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कौन हो तुम ?
सुधर नहीं सके ?
कुत्ते की दुम !
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भीगी बिल्ली सा
पर बनना चाहूं 
शेखचिल्ली सा ।
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एक कहानी
पीड़ा को पहचानी 
मीरा दीवानी ।
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जल ही जल
डूब गई फसल
क्या होगा कल !
*आजमगढ़, उ.प्र.
 

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