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वेदना
March 16, 2020 • संजय वर्मा "दॄष्टि" • कविता

*संजय वर्मा "दॄष्टि"

ना घर ,ना घौंसला 
मुंडेरो और कुछ बचे पेड़ों पर 
बैठकर गौरय्या ये सोच रही कि -
इंसानों को रहने के लिए
कुछ तो है मेरे देश मे 
सीमेंट कांक्रीट के मकान होने से 
क्या मेरे लिए कुछ भी नहीं है
मेरे शहर मे |

ची -ची बोल के 
बुद्दिजीवी इंसानों से 
कह रही हो जैसे 
इंसानों के हितो के साथ 
हमारे हितों का भी ध्यान रखो 
क्योकि हम गौरय्या पक्षी है |
कई प्रकार के विकिरण के प्रभाव से
वैसे ही हमारी प्रजाति कम हो रही है

नहीं तो गाते रह जाओगे
" छु न -छु न करती आई चिड़िया 
दाल का दाना ले चिड़िया। ... " 
और यही सवाल अनुतरित बन 
रह जायेगा महज किताबों मे
और नन्हे बच्चों के दिलो में

*संजय वर्मा "दॄष्टि" ,मनावर (धार )

 

 

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