ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
 नारी सौंदर्य का समाजशास्त्र (लेख)
October 6, 2019 • admin

*डॉ.निरूपमा*

सौंदर्य नर -नारी सभी में होता है ।जहां तक आकर्षण की बात है , वह भी दोनों में एक दूसरे के प्रति समान रूप से होता है । यहां तक कि सौंदर्य के प्रति प्रतिक्रिया भी दोनों में अपने व्यक्तित्वानुरूप , न्यूनाधिक होती है , ऐसा होने पर भी सौंदर्य का विचार नारी के संदर्भ में प्राय: किया गया है और उसे वस्तुगत धर्म की भांति नारी में देखने की प्रवृत्ति सी हो गई है । कारण , शास्त्र व साहित्य की सर्जना अधिकतर पुरुषों के द्वारा हुई । समाज में भी पुरुषों का ही महत्व अधिक रहा है अतः पुरुष ने अपने मन का प्रक्षेपण नारी में किया और अपनी संतुष्टि के लिए नारी का सुंदर होना उसने अनिवार्य समझा यही कारण है कि नारी का सौंदर्य के आधार पर मूल्यांकन अधिक हुआ और पुरुष ने मुक्त भाव से नारी सौंदर्य की महत्ता का विवेचन वर्णन किया । फिर नारी ने भी समाज व जीवन में पुरुषों की सत्ता को अनिवार्यत: कुछ अधिक ही स्वीकारा । इसका कारण सामाजिक तथा प्राकृतिक दृष्टि से पुरुष का अधिक पुष्ट होना , नारी का अबलत्व तथा भरण-पोषण के लिए पुरुष पर आधारित होना रहा । नारी ने पुरुष के विचारों तथा उसके द्वारा लगाए गए बंधनों को माना तथा उसका प्रिय आलंबन बने रहने के लिए अपनी सुंदरता पर अधिक ध्यान दिया । नारी का सुंदर दिखने के लिए बाहरी सज्जा का सहारा लेना तथा कुछ आंतरिक लज्जादि आदि गुणों से युक्त होना सब इसी धारणा के परिणाम हैं । एक तो पुरुष नारी - सौंदर्य की महत्ता का प्रचार कर रहा है तथा उसके लिए लालायित है , दूसरे नारी भी अपने सौंदर्य के प्रति काफी जागरूक है अर्थात सुन्दर बनने या बने रहने का प्रयत्न करती है । तथा स्वयं को सृष्टि की सर्वाधिक सुंदर रचना है , मानने लगी है ।

नारी का महत्व उसके सौंदर्य में निहित है इस तथ्य को प्रमाणित करने वाली पंक्तियां अनेक चरित काव्य में उपलब्ध है , नारी व्यक्तित्व की महत्ता सौंदर्य के साथ बहुत अधिक जुड़ी हुई है कुरूपता केवल निषेधात्मक ना होकर विधायक भी है । कुरूपता सौंदर्य का अभाव मात्र नहीं होती , उसकी अपनी विशिष्ट सत्ता और मूल्य भी होता है । सौंदर्य की तरह कुरूपता के अपने लक्षण हैं । सौंदर्य इंद्रियोंऔर मन को अपनी ओर आकृष्ट करके उनमें अनुकूल प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, तो कुरूपता से इन्द्रिय और मन दूर हट जाते हैं , उनमें प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है । इसलिए प्रत्येक नारी चाहती है कि उसे बुझे मन से स्वीकार करने या सहन करने की अपेक्षा पसंद किया जाना चाहिए । 

सौंदर्य वह तत्व है जो मन को जीतता है , तथा देवों को भी सुंदरियों का दास बना देता है । कहा भी गया है कि भुवन में स्त्रियों द्वारा कौन पराजित नहीं हुआ , किस से तपस्या नहीं छुड़वाई गई , किससे चरण स्पर्श नहीं कराया गया , तथा तीनों लोकों में किस से सेवा नहीं करायी गयी । नारी को पुरुष ने हमेशा भोग्या माना , और सुंदरी नारी मिल जाये , इसे अपना सौभग्य समझा । सौंदर्य का नारी व्यक्तित्व से निकट का संबंध है , पुरुष व नारी दोनों ही इस विषय में पर्याप्त सचेत रहते हैं । यदि पुरुष ने भोग दृष्टि से सौंदर्य को नारी के साथ धर्म की भांति जोड़ दिया है तो नारी ने भी पुरुष को लुभाने के लिए इसे स्वीकार कर लिया है , और वह आज भी इस दिशा में सतत प्रयत्नशील रहती है । 

नारी और आभूषण 

नारी सौंदर्य के साथ सोलह श्रृंगार और विभूषण (आभूषण ) इतना जुड़ गए हैं कि अब तो इनसे रहित नारी की कल्पना भी नहीं कि जा सकती । ये आभूषण शैने: शैने: धार्मिक मिथक बनकर सुहाग के चिह्न बन गए । यही कारण है कि स्त्रियां अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंतित चाहे न हो --बिछिया , सिंदूर , चूड़ी , मंगल सूत्र के लिए अधिक चिंतित रहती हैं । 

नारी के बाहरी सौंदर्य का महत्व कम नहीं है । वह स्थिर हो तो मन: प्रसादन करता है और गतिमय हो तो अधिक काम प्रेरक बन जाता है ।इसके अलावा , स्थूल सांसारिकता में जीने वालों के लिए तो यह बाह्य सौंदर्य , सज्जा तथा नारी की प्रेरक चेष्टाएँ ही सब कुछ हैं । परंतु सूक्ष्म सौंदर्य के ग्राहक सहृदय भी कम नहीं है जिनके अन्त:चक्षु खुले हुए हैं और जो दृश्य मान रूप में झलकते हुए चेतना के सौंदर्य से ही प्रभावित होते हैं । बाह्य रूप समृद्धि से युक्त पार्वती जब तपस्या की अग्नि में तप कर अस्थिशेष होकर अन्त : सौंदर्य का प्रामाणिक अवशेष मात्र रह गई , तब ही शिव का स्नेह पा सकी । सौंदर्य को ऐन्द्रिय नहीं मानसिक या आध्यात्मिक मानने वाले चेतना के अन्त:सौंदर्य को ही महत्व देते हैं । वही सच्चा सौंदर्य है , ऐन्द्रिय रूप का सौंदर्य मिथ्या और क्षणभंगुर है । मन की चेतना रूप में प्रति फलित होकर उसे उज्जवल बना देती है । सौंदर्यशास्त्र में इसे रूप की दीप्ति ( ग्लो ) की संज्ञा मिली है । यह दीप्ति वस्तु के चारों ओर एक आलोक मंडल की सृष्टि करती । उसकी तीव्रता और व्यापकता सौंदर्य के उत्कर्ष का प्रमाण है वास्तव में मन की सात्विकता जब बाह्य रूप में एकाकार हो उठती तब जो लावण्य झलकता है वही नारी का आंतरिक एवं वास्तविक सौंदर्य है ।

*डॉ.निरूपमा ,निरुमन विला ,वर्मा नगर ,आगरा रोड एटा (उत्तर प्रदेश),मो-9412282390

शब्द प्रवाह में प्रकाशित आलेख/रचना/समाचार पर आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया का स्वागत है-

अपने विचार भेजने के लिए मेल करे- shabdpravah.ujjain@gmail.com

या whatsapp करे 09406649733