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जिस खूँटे से बाँध गये तुम (नवगीत)
September 17, 2019 • admin

जिस खूँटे से बाँध गये तुम  

उस खूँटे पर टिकी हुई हूँ

पापाजी !

 

 खाने-पीने की सुविधा है    

सब कुछ है परिवार बड़ा है  

लोटे तो हैं चार-पाँच पर

पानी का बस एक घड़ा है   

मैं बस चौका-बरतन-पोंछा

और चपाती सिंकी हुई हूँ   

पापाजी !

 

घर में गेहूँ-धान-बाजरा

मुट्ठी भर अब चना नहीं है

खाली पड़ीं पतुकियाँ उठँगी

आटा भी कुछ सना नहीं है 

झाँपी बटुआ खोंइछा खाली  

मैं अनाज की बिकी हुई हूँ 

पापाजी !

 

मोल गई है जबसे चूड़ी 

ईंगुर ताना मार रहा है

छत पर सूरज रोज उतरकर  

चितवन-ढेला मार रहा है

अंदर से मैं टूट चुकी हूँ 

मन से भी मैं डिगी हुई हूँ

पापाजी !

 

*शिवानन्द सिंह 'सहयोगी','शिवाभा' ए-233 गंगानगर ,मेरठ ,उ.प्र.,दूरभाष-  9412212255