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किसकी मरज़ी (लघुकथा)
October 1, 2019 • admin

*कोमल वाधवानी 'प्रेरणा'*

पास के कमरे से खुसर-पुसर जैसी ध्वनियाँ शांति देवी के कानों में अकसर पड़ती रहतीं। वह खूब समझती थी कि मुद्दा क्या है .... पर आज तो यह धीमी आवाजें तेज़ होते-होते बहस झगड़े में तब्दील हो घर की चौखट पार करने लगीं ....इज्ज़त भी कोई चीज़ होती है.... इससे किसी को आजकल कोई मतलब ही नहीं रहा ....हवा ही ऐसी चल पड़ी है।

परदा सरका वह पंकज के सामने जा खड़ी हुई, " शांssत हो जाओ... तुम दोनों मुझसे छुटकारा चाहते हो न ! मुझे वृद्धाश्रम भेजना चाहते हो न ! भेज दो ....कल ही भेज दो ....ये रोज़-रोज़ की खिटपिट मुझे भी पसंद ....।"

पूजा की बाँछें खिल उठी, चेहरा चमक उठा। नेकी और पूछ-पूछ।

" ......पssर...मेरी एक शर्त है !"

शांति देवी ने तीख़ी नज़रें दोनों पर जमा दी।

"इस घर में मैं ढोल- ढमाकों के साथ आई थी, वैसे ही जैसे तेरी पत्नी .....। मैं आख़िरी बार इस घर से निकलूँगी.... तो मेरी अंतिम इच्छा है कि ढोल -ढमाके, बैंड - बाजे न सही पर एक ढोली मेरे आटो रिक्शा के आगे-आगे ढोल बजाता वृद्धाश्रम तक चले ....वैसे भी मैं अगर मर गई होती तो बैंड-बाजे के साथ मुझे श्मशान तक ले ही जाते ...... सही है न ?"

सुनकर पंकज ने गरदन झुका ली ...पूजा ढीठ बन खड़ी रही। शांति देवी कमरे में जा स्व. पति के फोटो को देख फफक पड़ी।

अगले दिन दालान में धूप सेंकते पड़ोसियों ने देखा कि

"मातृछाया सदन" के बाहर एक ऑटोरिक्शा आकर खड़ा है ....ढोली ढोल बजा रहा है । शांति देवी बाहर निकली। पीछे-पीछे एक संदूक लिए पंकज। उसके पीछे अपनी मां की अंगुली थामे चला आ रहा था मोनू ....अपनी ही मस्ती में .....इस बात से बेख़बर कि क्या होने जा रहा है!

शांति देवी ने सदन को आख़िरी बार निहारना चाहा, पर निगोड़े नयन उसकी छवि को धूसर करने को आमादा थे। पल्लू में आँसुओं को समेटे उन्होंने भौचक्क पड़ोसियों की ओर हाथ जोड़े ....मानो विदा ले रही हों। उनमें से कोई भी रिक्शा के करीब़ न आया ....पर दूर से ही हाथ जोड़ उन्होंने जबाव ज़रूर दिया। पूजा की देखादेखी मोनू ने भी दादी के चरण छुए।

" मम्मा , दादी अकेली कहाँ जा रही है ? मैं भी जाऊँगा .....। "

पूजा ने झट से मोनू को अपने से सटा लिया और पड़ोसियों की ओर देख उच्च स्वर में कहा, " बेटा , दादी अपने बराबर की बूढ़ी औरतों के साथ रहने जा रही हैं ... अपनी मरजी से। "

पंकज ने स्कूटर स्टार्ट किया ।रिक्शा हौले - हौले बढ़ने लगा तो ढोली ढोल पीटता उसके आगे - आगे ।

*कोमल वाधवानी 'प्रेरणा',"शिवनंदन", 595 , वैशाली नगर (सेठीनगर),उज्जैन (म.प्र.) मो.9424014477

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