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अहिंसा-दिवस: परंपरा, उद्देश्य और महत्व
September 30, 2019 • admin


*डॉ. दिलीप धींग*
अहिंसा भारतीय संस्कृति का बुनियादी तत्व है। भारत में सदियों से अहिंसा-दिवस मनाया जाता रहा है। भारत में अहिंसा-दिवस को अमारि, अगता या अक्ता भी कहा जाता है। कहीं-कहीं अहिंसा-दिवस को पशु-वध निषेध दिवस, निरामिष दिवस या शाकाहार दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। अहिंसा-दिवस सभी भारतीय धर्मों और वर्गों में तथा सभी क्षेत्रों में निष्ठा के साथ मनाये जाते रहे हैं। इस सम्बन्ध में कुछ व्यक्ति जिज्ञासा करते हैं कि महज एक दिन या कुछ दिन पशु-पक्षी वध और बूचड़खानों के संचालन पर प्रतिबंध लग जाने से क्या फर्क पड़ जाता है। अहिंसा-दिवस के सम्बन्ध में तीन बिन्दु मननीय हैं - 
 हिंसा का अल्पीकरण भी अहिंसा है। 
 हिंसा को स्थगित करना भी अहिंसा है। 
 हिंसा की मांग व पूर्ति को प्रतिबंधित करना भी अहिंसा है।
अहिंसा-दिवस के पालन से हिंसा एक या कुछ दिनों के लिए स्थगित की जाती है। इससे जनजीवन में अहिंसा के प्रति अनुकूल वातावरण बनता है। दूसरा अहिंसा-दिवस के माध्यम से सीधे तौर पर हिंसा की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगाया जाता है। 
प्राचीन ग्रंथों के अवलोकन से पता चलता है कि उस जमाने में सामिष भोजन करने वालों में भी यह चेतना थी कि अमुक दिनों में उन्हें मांसाहार नहीं करना है। इस चेतना के फलस्वरूप अल्पसमय के लिए हिंसा की मांग में कमी होती है। मांग और पूर्ति अन्योन्याश्रित हैं। अर्थशास्त्र के अनेक नियम तथा वस्तुओं के दाम मांग और पूर्ति के सिद्धान्त के अनुसार तय होते हैं। हम सामान्य तौर पर देखते हैं कि जब जलापूर्ति या बिजली वितरण में कटौती की जाती है तो उनका उपभोग कम हो जाता है। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि जल या बिजली की बचत के लिए उनके वितरण में कटौती की जाती है। इसी प्रकार राज्य की ओर से जितने अंशों में या जिस किसी रूप में हिंसा में कटौती की जाती है या हिंसा पर अंकुश लगाया जाता है, उतने ही अंशों में अहिंसा को राज्याश्रय मिलता है। अहिंसा को राज्याश्रय मौजूदा समय की सबसे बड़ी जरूरत है। 
एक प्रश्न और उठाया जाता है कि अहिंसा-दिवस घोषित तो हो जाते हैं लेकिन उनका पालन ठीक ढंग से नहीं होता है। राजकीय आदेश पहली बात है, वह कानूनन बाध्यकारी होता है। सरकारी आदेश के सही अनुपालन के लिए शासन, प्रशासन और जनता - सबकी जिम्मेदारी बनती है। जब अन्य नियमों के प्रति समाज, सरकार, मीडिया आदि पर्याप्त चौकन्ने रहते हैं तो अहिंसा-दिवस के पालन में ढिलाई कतई उचित नहीं है। जागरूक व्यक्तियों द्वारा अहिंसा-दिवस के सही अनुपालन के लिए समाज में माहौल बनाया जाना चाहिये। अहिंसा-दिवस के अनुपालन में सबका सहयोग अपेक्षित है। अहिंसा सबकी है और सबके लिए है। वह जोड़ती है। अहिंसा की आराधना में पंथ, जाति, वर्ग आदि भेदों की उपेक्षा की जानी चाहिये। अहिंसा दिवस के समुचित अनुपालन के लिए निम्न प्रयासों के अच्छे परिणाम मिल सकते हैं - 
 समस्त अहिंसक व शाकाहारी समाज अहिंसा-दिवस पालन को सुनिश्चित करवाने में प्रतिबद्धता दर्शाएँ। 
 सामिषभोजी व्यक्तियों को चाहिये कि वे अहिंसा-दिवस पर मांस क्रय करके गैर-कानूनी कार्य नहीं करें। 
 वध-व्यवसाय से जुड़े व्यक्तियों को उनके व्यवसाय से जुड़े कानूनी नियमों के पालन का दायित्व समझना/समझाना चाहिये। 
 मीडिया, प्रशासन व स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से तथा अन्य उचित तरीकों से सम्बन्धित व्यक्तियों को कानून के अनुपालन के लिए प्रेरित करना चाहिये। 
 शासन व प्रशासन को उनके कानूनी फर्ज को निभाने की याद दिलानी चाहिये और चूक करने पर उनके प्रति नाराजगी व्यक्त करनी चाहिये तथा उचित तरीके से उनका ध्यान आकृष्ट करना चाहिये। 
 अहिंसा और प्राणिरक्षा के पक्ष में प्रचुर तथ्य हैं। अहिंसा-दिवस के अनुपालन के लिए ऐसे तथ्य समाज, प्रशासन और आम आदमी तक पहुँचाए जाने चाहिये। 
सकारात्मक नजरिये से विचार किया जाए तो जितने अंशों में अहिंसा-दिवस का पालन होता है, उतने अंशों में हिंसा का अल्पीकरण मानते हुए आगे और अधिक प्रयास करने चाहिये। जैन ग्रन्थों में अहिंसा दिवस के समर्थन में अनेक सूत्र, सन्दर्भ व प्रसंग मिलते हैं। अहिंसा-दिवस के माध्यम से जीवों का वध रुकता या टलता है तो वह भी अहिंसा का एक रूप ही है। मगध सम्राट श्रेणिक को जब उनके नरकगामी होने का पता चलता है तो नरक से बचने के लिए वे विविध उपाय करते हैं। तीर्थंकर महावीर द्वारा एक उपाय उन्हें यह सुझाया गया कि यदि वे कालशौकरिक कसाई से पशुवध बंद करवा दे तो उनकी नरक टल सकती है। जीव हिंसा रुकवाने के महान फल के पक्ष में ही आगम ग्रन्थों में अभयदान (जीवनदान) को सर्वोŸाम दान कहा गया है। जीवनदान की यह परम्परा आगम युग से आज तक चली आ रही है। 
इस परम्परा में आचार्यों, सन्तों और अहिंसानिष्ठ व्यक्तियों ने अपने प्रभाव से हर कालखण्ड में अहिंसा-दिवस की विविध राजकीय घोषणाएँ करवाईं। आचार्य हेमचन्द्र के उपदेश से गुजरात के महाराजा कुमारपाल (12वीं सदी) ने उनके अधीनस्थ सभी 18 देशों में निरन्तर 14 वर्षों तक अहिंसा-दिवस की घोषणा का पूर्णतः पालन करवाकर अगणित मूक पशु-पक्षियों को जीवनदान दिया। शान्ति, सुरक्षा, समृद्धि और सर्वांगीण विकास की दृष्टि से कुमारपाल का शासनकाल भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल था। अहिंसा के अनुपालन से समग्र और स्थायी उन्नति का यह अमर ऐतिहासिक उदाहरण है। सम्राट् अशोक द्वारा की गई अहिंसा की उद्घोषणाएँ आज भी शिलालेखों में विद्यमान है। आचार्य हीरविजयसूरि की प्रेरणा से सम्राट् अकबर ने पर्युषण तथा कई भारतीय पर्व उत्सवों पर अहिंसा-दिवस के अनेक फरमान जारी करके उनका पालन करवाया था। जैनाचार्यों की प्रेरणा से अकबर ने स्वयं भी मांसाहार का त्याग कर दिया था। मेवाड़ के महाराणा भी अनेक अहिंसा-दिवस घोषित करवाते और उनका समुचित पालन करवाते थे। 
14 मार्च 2008 को सर्वोच्च न्यायालय ने जब यह निर्णय सुनाया कि जैन धर्मावलम्बियों की धार्मिक भावनाओं का आदर करते हुए पर्युषण के दौरान नौ दिन तक कत्लखाने बन्द रखे जाने चाहिये, तब उस निर्णय में अकबर का भी हवाला दिया गया था। इस क्रम में देश के अनेक राज्यों में अनेक भारतीय पर्वों तथा पुनीत अवसारों पर शासकीय स्तर पर अहिंसा-दिवस की घोषणा और अनुपालन किया जाता है। 
जैन दिवाकर मुनि चौथमलजी (1877-1950) का सम्पूर्ण जीवन प्राणियों के अवध और जीवों की अहिंसा के लिए समर्पित था। तत्कालीन रियासतों और ठिकानों की ओर से उनकी प्रेरणा से हुए अहिंसा के आदेशों में अनेक मननीय तथ्य मिलते हैं। यथा - 
 उनसे पूर्व भी शासन की ओर से कई अहिंसा-दिवस घोषित थे। दिवाकरजी की प्रेरणा से शासकों ने विद्यमान अहिंसा-दिवसों के प्रभावी पालन का संकल्प व्यक्त किया और कुछ नये अहिंसा-दिवसों की घोषणा और अहिंसा के संकल्प किये। 
 एक साथ कई दिनों, सप्ताहों, पखवाड़ों और महीनों तक निरन्तर अहिंसा-दिवस कायम रहते थे। जैसे कई रियासतों या ठिकानों की ओर से जन्माष्टमी से लगाकर अनन्त चतुर्दशी (22 दिनों) तक तथा सम्पूर्ण श्राद्ध पक्ष में बूचड़खाने बन्द रहते थे तो कई स्थानों पर पूरे श्रावण और भादवा; कहीं श्रावण, भादवा, कार्तिक और वैशाख तो कहीं निरन्तर चार महीने चौमासे के अहिंसा-दिवस के रूप में उल्लेखित हैं। कुछ जगहों पर अन्य दिनों के अलावा माह की दोनों एकादशी तथा पूर्णिमा व अमावस्या को भी स्थायी अगते घोषित थे। 
 कुछ राजाओं की ओर से अधिक मास होने की स्थिति में पूरा अधिक मास अहिंसा-दिवस के रूप में घोषित था। 
 स्टेट कौंसिल जोधपुर (राजस्थान) में अगता कमेटी बनी हुई थी, जो अहिंसा-दिवस की घोषणा और उनके सही अनुपालन के लिए कार्य करती थी। 
 अहिंसा-दिवस के अन्तर्गत मुख्यतः बूचड़खाने और मांस-मछली की दुकानें बन्द रहती थीं। जलाशयों में मत्स्याखेट और जंगलों में शिकार भी प्रतिबंधित रहता था। कई आदेशों में शराब की दुकानें बन्द रखने और मदिरा-निर्माण की भट्टियों पर प्रतिबंध का भी उल्लेख है। 
स्पष्ट है कि भारतीय धर्मों में पर्व तिथियों पर अहिंसा-दिवस की प्राचीन परम्परा रही है। जैन समाज ने इस परम्परा को आगे बढ़ाने में अहम् भूमिका निभाई है। अनेक भारतीय पर्व-तिथियों पर समय-समय पर अहिंसा-दिवसों की घोषणा और उनका अनुपालन किया और करवाया जाता है। राजस्थान में प्रतिवर्ष सत्रह दिनों के लिए स्थायी अहिंसा-दिवस घोषित हैं। उनमें गणतंत्र दिवस, शहीद दिवस, महाशिवरात्रि, महावीर जयन्ती, रामनवमी, गणेश चतुर्थी, ऋषि पंचमी, अनन्त चतुर्दशी, बुद्ध पूर्णिमा, स्वतन्त्रता दिवस, जन्माष्टमी, गांधी जयन्ती, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा (गुरु नानक जयन्ती) आदि प्रमुख हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय और श्रम विभाग के आदेश के अनुसार प्रत्येक शुक्रवार को भी अहिंसा-दिवस घोषित है। कुछ जिलों में जिला स्तर पर अग्रसेन जयन्ती, अंबेडकर जयन्ती आदि दिनों के लिए भी अहिंसा दिवस घोषित किये जाते हैं। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयन्ती और अन्य कुछ विशेष अवसरों पर राज्य की ओर से मद्य-निषेध भी लागू रहता है। 
राजस्थान की अहिंसा दिवस की सूची देखने से पता चलता है कि अहिंसा भारत की आत्मा है। इसमें बिना किसी भेदभाव लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक पर्वों पर अगता पलवाने की शुभ परम्परा को कायम रखने का प्रयत्न किया गया है। अन्य राज्यों में भी स्थायी या अस्थायी अहिंसा-दिवस घोषित हैं। अहिंसा-दिवस के वांछित परिणाम और व्यापक सफलता के लिए सभी समुदाय के व्यक्तियों को मिलकर कार्य करना चाहिये। 
आज संसार अनेक समस्याओं और संकटों से घिरा हुआ है। यदि सभी समस्याओं को एक ही शब्द में कहना पड़े तो वह है - हिंसा। और यदि एक ही शब्द में कोई समाधान है तो वह है - अहिंसा। अहिंसा का प्रकृति और पर्यावरण पर बेहद अनुकूल प्रभाव होता है। इस सम्बन्ध में अहिंसा-दिवस के महत्व को प्रतिपादित करने वाली एक घटना बहुत प्रेरक है। सन् 1927 में जैन दिवाकर मुनि चौथमलजी का वर्षावास जोधपुर में था। बारिश नहीं होने की वजह से तत्कालीन जोधपुर स्टेट के प्रधानमंत्री की ओर से बारिश की मन्नत के साथ प्रजा से एक दिन भक्ति-दिवस के रूप में मनाने के लिए उद्घोषणा की गई। दिवाकरजी ने जब यह उद्घोषणा सुनी तो उन्होंने कहा कि जब तक मूक प्राणियों की गर्दन पर छुरे चलते रहेंगे, तब तक कोरी भक्ति या प्रार्थना से कुछ नहीं हो सकता। सुकाल के लिए कत्लखानों को बन्द करवाना होगा। दिवाकरजी के सुझाव पर भक्ति-दिवस को अहिंसा-दिवस या अहिंसामय भक्ति-दिवस के रूप में मनाने की संशोधित उद्घोषणा हुई। घोषणा के अनुसार पशुवध और वधगृहों का संचालन पूर्णतः बन्द रहा। इसे अहिंसा का सुप्रभाव ही कहना चाहिये कि दूसरे ही दिन हुई जोरदार वर्षा से अकाल का अंधेरा, सुकाल के सवेरे में बदल गया। वध-निषेध, मांस-निषेध और बूचड़खानों के संचालन पर प्रतिबंध को लेकर वर्तमान में अनेक नये आयाम जुड़े और जुड़ रहे हैं। कत्लखानों के विरुद्ध आवाज उठ रही है। 
शान्ति के लिए अहिंसा-दिवस की भारतीय परम्परा का महत्व संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी समझा और वर्ष 2007 से अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के जन्म दिन 2 अक्टूबर को प्रतिवर्ष 'विश्व अहिंसा-दिवस' के रूप में घोषित किया। लेकिन अहिंसा-दिवस के स्वरूप को दुनिया के समक्ष सही और व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना अभी शेष है। यह तो सब कहते हैं कि दुनिया, मानव और मानवता को बचाने के लिए अहिंसा ही एक मात्र रास्ता है। किन्तु दुनियावालों को यह समझना चाहिये कि निरीह पशु-पक्षियों की हत्या रोके बिना, शाकाहार अपनाए बिना अहिंसा की बात अधूरी रहती है। 
घातक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने के लिए भी जीवहत्या और मांसाहार पर अंकुश आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत कार्य करने वाली नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने अपील की है कि कोई व्यक्ति या समाज पूरी तरह शाकाहार नहीं अपना सके तो भी हफ्ते में कम-से-कम एक दिन तो वह मांस जरूर छोड़े। आईपीसीसी की यह वैश्विक अपील अहिंसा-दिवस का ही रूप है, जिसमें पर्यावरण की रक्षार्थ सप्ताह में एक दिन पूर्ण शाकाहारी रहने का आग्रह किया गया है। अनेक पश्चिमी देशों में 'मीटलेस मंडे' (मांसरहित सोमवार) अभियान चल रहा है, इसे साप्ताहिक अगता (अहिंसा-दिवस) कहा जा सकता है। वस्तुतः अहिंसा-दिवस की परम्परा को आगे बढ़ाना समय की मांग है और आवश्यकता भी।
*डॉ. दिलीप धींग,निदेशक: अंतरराष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन व शोध केन्द्र,सुगन हाउस, 18, रामानुजा अय्यर स्ट्रीट,,साहुकारपेट, चेन्नई-600001

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